क्या थे
क्या हो गए हैं हम और क्या होना है, बाकी अभी – कितनी विचित्र बात है ना!
देशभक्ति
और देशभक्त नाम सुनकर सीना चौड़ा हो जाता था, बाजू फड़कने लगते थे आज उसी नाम को शक की नजर से देखा जा रहा है | कहाँ
सूख गई हैं वे संवेदनाएं कहाँ छुप गई है वो बहादुरी ? सच का
दम भरने वालों को जरा याद तो कर लो | आज तो आलम यही मांग करता है कि कुछ ऐसी तान सुनाओ कि उथल – पुथल मच जाए |
हाँ राष्ट्र को बचाने की खातिर फिर तान छेड़नी होगी | धन दिखाकर तो अनैतिक कार्य करवाए जाते हैं किन्तु भयावह तब हो जाता है जब
बुद्धि पर मार करके कुछ स्वार्थी लोग अपना सिक्का चलाते हैं | अरे ! क्या सोच पर ताले पड़ गए हैं कि अच्छे और बुरे में अंतर ही नहीं कर
सकें | घर की फूट तो महाभारत ही
रचाएगी | आश्चर्य होता है शिक्षा के गढ़ की बुनियाद इतनी कमजोर
साबित हो रही है | जेएनयू की यह आग एक दिन में तो दावानल बनी
नहीं | उस चिंगारी को ही भुजा
दिया होता तो ये लपटें इतनी ऊँची नहीं उठती | जिनके भरोसे हम
सुख की नींद सो रहे हैं, जो अपनी जान जोखिम में डाले रहते
हैं, उनके प्रति कृतज्ञता होनी चाहिए, सम्मान
होना चाहिए अन्यथा वो दिन दूर नहीं कि कोई भी सेना में भर्ती नहीं होगा| देश के जवानों को हमारा प्यार और सम्मान ही चाहिए | वो
वीर हैं सच्चे वीर हैं जो जाति, धर्म, और
सम्प्रदायों से परे केवल मातृभूमि को अपना धर्म और कर्म मानते हैं | भारत माता के ऐसे सच्चे सपूतों को शत शत प्रणाम ! वीर तुम बढे चलो धीर तुम बढ़े चलो ......|
स्त्री
शोषण और सत्ता
‘उत्पीड़न
बनाम राजनीति’ सम्पादकीय स्त्री के शोषण की भयावह तस्वीर पेश करता है | जबरन निकाह
फिर तलाक फिर हलाला यह रुढ़िवादी संकीर्ण सोच है | स्त्री को वस्तु मानकर मनमाना
व्यवहार उसके वजूद को हिला देता है | जब ऐसे अमानवीय कर्म के प्रति कोई कानून का
प्रावधान रखा जाता है तो सत्तालोलुप नेता
अल्पसंख्कों के मसीहा बन रोड़े अटकाने लगते हैं|
विरोध की हाय तोबा में स्त्री की सिसकती आवाज और
बच्चों की बर्बादी की तकलीफ दब कर रह जाती है | अल्पसंख्यक महिलाओं के शोषण और
उत्पीड़न को जब एक औरत वैध घोषित करती है तब ‘औरत ही औरत की दुश्मन होती है’ वाली
कहावत चरितार्थ हो उठती है | कुछ राजनेता अपनी
महत्वकांक्षी रोटी अल्पसंख्य रूपी
तवे पर सेंक रही है यह जग जाहिर है |
अब समय है कि इन नेताओं की चिकनी चुपड़ी बातों में
न आकर स्त्री शोषकों तथा उनके समर्थकों को सबक सीखना चाहिए |
नमस्कार महोदय,
प्रतिबंध नशे पर, गुटखे पर लेकिन कब तक जब तक कि सुर्ख़ियों में न आ जाएं ? यक्ष प्रश्न है कि क्या रोक लगाने से लोग पीना छोड़ देंगे ? यह तो ऐसा ही हुआ कि मुझे पीने का शौक नहीं ....| लेकिन क्यों नहीं ? मिलता है तब ही तो अपनी गाढ़ी कमाई गटक जाते हैं |गुटका, शराब, तन,मन और धन सब छीन लेते हैं | अत: इनका बंद होना अत्यावश्यक है जब ना रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी |
प्रतिबंध नशे पर, गुटखे पर लेकिन कब तक जब तक कि सुर्ख़ियों में न आ जाएं ? यक्ष प्रश्न है कि क्या रोक लगाने से लोग पीना छोड़ देंगे ? यह तो ऐसा ही हुआ कि मुझे पीने का शौक नहीं ....| लेकिन क्यों नहीं ? मिलता है तब ही तो अपनी गाढ़ी कमाई गटक जाते हैं |गुटका, शराब, तन,मन और धन सब छीन लेते हैं | अत: इनका बंद होना अत्यावश्यक है जब ना रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी |
इस
शराब ने अच्छे - अच्छों को बर्बाद कर दिया है |
कड़ी मेहनत
के बाद शाम को लोग शराब की दुकान पर मक्खी की तरह भिनभिनाने लगते हैं |लोग
दूसरों की बर्बादी पर अपना आशियाना खड़ा करते हैं | क्या यही एक व्यसाय है |
हाँ तो बदल डालिए इसे |
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