Saturday, April 11, 2020

झुर्रियों के भी होते हैं अरमान ......


       

‘स्त्रवन समीप भये सित केसा ..’ सम्पादकीय ने ध्यान आकृष्ट किया | उम्र का एक महत्वपूर्ण पड़ाव|
बालों में सफेदी झलकने का तात्पर्य यह होता था कि अब आराम करने तथा जिम्मेदारियों से थोड़ा सा मुक्त होकर कुछ अपने ‘मन’ भी करें यह विचार ही सुखद एहसास था  वहीँ आज यह पड़ाव अपने वजूद को हिलाने वाला बनकर रह गया है | आज व्यक्ति को भय, चिंता, असुरक्षाभावों  घेर लेता है क्यों? क्योंकि हमारे समाज में वृद्धों की स्थिति देख मन सिहर जाता है | आज का युवा भोग विलास की दौड़ में अंधाधुंध भागा जा रहा है| चकाचौंध तो बहुत है, पर संवेदनाओं से रीता है | उपराष्ट्रपति जी का कथन “भारतीय सांस्कृतिक विरासत, परम्पराओं और इनके इतिहास को नई शिक्षा नीति का हिस्सा बनाना होगा” अनुकरणीय है क्योंकि वैश्वीकरण के इस दौर में शिक्षा का आधार पैसा कमाना ही बन कर रह गया है | दुर्भाग्यवश ये नैतिक मूल्य जो शिक्षा को सच में ‘शिक्षा’ बनाते है, कहीं न कहीं छूट रहे हैं | आलम यही है कि आज अनैतिकता  हर जगह पैर पसारने लगी है | भारतीय संस्कृति  में चार आश्रम तो थे पर ‘वृद्धाश्रम’  कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं जो वृद्धों की असहाय और बेबस स्थिति के  परिचायक हैं | हमें याद रखना होगा कि बुजुर्ग परिवार की प्रतिष्ठा, परंपराओं और औचित्यपूर्ण मूल्यों के संरक्षक होते हैं | श्री वेंकैया नायडू जी का यह  सुझाव शिरोधार्य एवं अनुकरणीय | यह न भूलें कि उम्र के इस पड़ाव से सभी को गुजरना है |

No comments:

Post a Comment

 <a href="https://www.teacheron.com/tutor-profile/8YoD?r=8YoD" target="_blank" style="display: inline-block;...