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Sunday, April 12, 2020

हवा में तैरता ज़हर



हवा में तैरता जहर नामक झलकी आपको दिखाते हैं -----

धरती का प्रवेश --- मै धरती, वसुधा, वसुंधरा | कितना सुन्दर रूप है मेरा | पशु-पक्षी मानव सबका यहाँ है बसेरा |
मानव का प्रवेश – हा हा हा --- विकास ही विकास चारों ओर विकास | चाँद क्या मंगल पर पहुंच रहा हूँ| वहाँ  भी इमारतें बनाऊंगा खूब लाभ कमाऊंगा | गगन चुम्बी इमारतें वाह ! वाह ! (खांसता है)
२०५० की धरती का प्रवेश – हैरान | अपनी सुविधाओं के लिए तुमने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है |
मानव – तुम कौन हो ?
धरती – मैं धरती माँ  हूँ | जिसके पान से तुम पले बढ़े, जिसके आँचल में खेले कूदे वही धरती हूँ मैं|
मानव – ओह यू मीन अर्थ !
धरती – अरे अक्ल के अंधे तुमने मेरा अर्थ समझा ही कब है ?
मानव – लेकिन तुम तो काली कलूटी हो गई हो  | मैंने तो पढ़ा था धरती तो हरी भरी सुन्दर होती है |
धरती – हाँ, थी मैं हरि भरी किंतु आज मेरी इस हालत के जिम्मेदार तुम हो | तुम्हारे लोभ, लालच ने मुझे छलनी कर दियाहै  बंजर कर दिया है |
मानव – लेकिन  मैंने तो विकास किया है |
धरती – हँसते हुए – विकास | अरे दुष्ट मानव,विकास नहीं विनाश किया है |
बीमार का प्रवेश – अब भुगतो | बोया पेड़ बबुल का तो आम कहाँ से खाए |
धरती – कितने फल फूल हम देते हैं , फिर भी अनजान बने हो |
      रो रो कर पुकार रही हूँ फिर भी ये हाल कर रहे हो |
मानव – सर पकड़ कर, हे भगवान् मैंने क्या किया, सुखों की आड़ में जीवों को मार दिया |
धरती - अब भी समय है जागो ... हरित हारम नहीं सुना ?
गली-गली में पेड़ लगाओ हर प्राणी में आस जगाओ | जागो बच्चो, जागो मानव

 वसुंधरा पर सवास्थ्य शक्ति का आधार हो 
उपाय करो कुछ ऐसा
कोई प्राणी धरती पर ना हो बीमार हो  |
क्योंकि क्योंकि पर्यावरण ही  जीवन आधार है  |


  
           

    
      

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