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Saturday, April 11, 2020

लॉकडाउन


                                                                                        
माँ ! > ओ माँ कुछ खाने  को दो न | छोटू के होठों पर पपड़ी जम आई थी | पाँच बरस के छोटू ने पल्ला खींचते हुए जिद्द की |  हूँ, एक कराहती देह जो टूटी चटाई के तारों से लगी हुई थी, में कुछ हलचल हुई | हाँ बिटवा, कठड़े में रोटी का टुकड़ा पड़ा है खाले,कहते हुए उसने पानी का गिलास आगे सरका दिया | सूखी रोटी का नुकीला कोना नरम हलक में चुभते हुए कंठ से तकरार करता हुआ उतरने लगा | बाहर से लड़खड़ाती आवाज़ सुन छोटू का हाथ मुँह में ही अटका रह गया |  मोहिनी ने तुरंत बच्चे को अपने डैनों में छुपा लिया | अरे क्या मर गई, कहाँ है ? ला खाना दे | साला लॉकडाउन .....| सब बंद और उसने खाली बोतल आँगन में दे मारी | सुना नहीं ..एक भद्दी सी गाली | कहाँ से लाऊं ? सुबह की मार से गुस्साई मोहिनी ने दो चार खाली डिब्बे उसके सामने पटक दिए, जिसमें से एक चुहिया जान बचाकर भागी |
हमारी छोड़ो इन बच्चों का पेट पीठ से जा मिला है, इनका ध्यान भी है तुम्हे ? इतना सुनते ही टूट पड़ा वह, मुझसे जबान लड़ाती है,उसने अधमुंदी, अधखुली आँखों से इधर-उधर देखा पास में एक पाइप का टुकड़ा पड़ा था | बस क्या था ताबड़तोड़ बरसा दिए उसने | मोहिनी की पीठ झरने लगी | बच्चे माँ से लिपट कर सिसकने लगे | वह गाली गलौच करते हुए वहीँ खटिया पर लुढ़क गया | अंधरे ने रात को समेट लिया था | दुनिया नींद के आगोश में कस गई  पर मोहिनी को नींद कहाँ ? उसने अपने हाथ को मोड़ तकिया बना सोने की कोशिश करने लगी, मोहिनी के  हाथ सूज गए थे | हाथ ही तो थे जो उसके बचाव में आड़े आ जाते थे | यह तो रोज का हाल है लेकिन इस ‘कोरोना’ ने तो रोना ही छोड़ा है बस | आज तो चार दिन ही हुए हैं आगे क्या होगा ? सुबह ऑटो लेकर निकल जाता था | शाम को ही शामत आती थी | अब तो चौबीस घंटे इसका शिकार होना पड़ता है, हर तरीके से | मैं भी इनसान हूँ, यह इस राक्षस को कौन समझाए ? मैंने दो दिन से कुछ खाया नहीं ,अब तो पानी भी कलेजे में अटकने लगा है | एक बार भी पूछा इसने, खुद को जो चाहे जोर जबरदस्ती बस चाहिए ही | उसका मन घृणा से भर उठा | अपनी उधड़ी किस्मत की तुरपाई में लगी थी वह कि जग्गा की आवाज़ | काँप उठी वह | उसने पानी दिया | इधर आ | बस क्या था जानवर की भूख |
सुबह मुँह अँधेरे ही मोहिनी जाग गई, वैसे सोई ही कब थी ? आज पाँचवा दिन था, वह रोज दिन गिनती कि इस बीमारी से निजात मिलेगी तो मुझे भी इस ... शब्द उसके गले में ही फँस गए और  मन रुआंसा हो आया  |

अब तो कपड़ा बर्तन के लिए भी कोई झाँकने नहीं देता | कल की बात याद आई उसे मेमसाहब ने कैसे कहा था दूर ही रहो | वैसे एक दिन भी न जाओ तो आसमान सिर पर उठा लेती थीं | आज ऐसा बर्ताव | वो भी क्या करे मुई बीमारी ही ऐसी है| उसका सिर चकराने लगा था| ये बच्चे क्या जाने लॉक डाउन, बंद, महामारी ? उसके मन में एक हूक सी उठी कि क्या यह बीमारी भगवान से बड़ी है कि उसने भी अपने पट बंद कर लिए हैं उसकी आँखों के कोरों से गर्म बूंद निकल कर गालों पर लुढ़क आई | उसका ध्यान न चाहते हुए भी पति की ओर चला गया | यह कुम्भकरण उठते ही हाय तौबा मचाएगा |  इंतजाम नहीं हुआ तो लातों से स्वागत करेगा मेरा |कहते हुए फिर बच्चों के सूखे चेहरों को देखने लगी,कलेजा मुँह को आ गया उसका | हे भगवान मुझे ही कर दे ‘कोरोना’ | पर मेरे बच्चे ..? तड़प उठी वह | जागते ही जग्गा ने चाय की फरमाइश की | दूध कहाँ है ? और चीनी भी कल ही खतम हो गई थी | यह सुन जग्गा पैर पटकता हुआ बाहर चला गया | ऑटो को जोर से  लात मारी क्योंकि उसका भी किराया चुकाना है | वह उठी और पड़ोसन से चीनी माँग कर काली चाय बनाई | चाय का गिलास थमाते हुए बोली कि चावल का दाना नहीं है | जग्गा ने कुछ कहा तो नहीं पर खा जाने वाली नजरों से घूरने लगा | फिर गिलास पटककर बाहर चला गया | मोहिनी ने चैन की साँस ली | फिर बुदबुदाने लगी कि चूल्हा कैसे जलेगा ? उसे ध्यान आया पड़ोस में राधा भाभी के यहाँ टी.वी है आज तो कुछ अच्छी खबर की आशा में वह चल पड़ी | कब खुलेगा काम ? मोहिनी ने निराश मन से पूछा | उसे बीमारी, महामारी,,देश दुनिया से क्या मतलब यह तो बड़े लोगों का काम है, वे देख ही लेंगे | उसकी दुनिया तो उसके भूखे  बिलबिलाते बच्चे  हैं | राधा ने कहा अरे मोहिनी काहे की बीमारी यह तो माणस खाणी बेमारी है | दुनिया ने निगले वास्ते आई है | अच्छा ... | बस इतना कह पाई वह | मोहिनी ने फिर पूछा, यह बताओ बाहर जाने दिया जा रहा है ? ना रे ! लंबे साँस के साथ कह गई वह कि बाहर जाने से ही तो ज्यादा फ़ैल रही है बीमारी | वह उदास हो गई | झिझकते हुए पूछ ही लिया भाभी थोड़े चावल हैं ? जब लाऊंगी तो पहले के साथ ये भी दे दूंगी | देख हैं, तो हमारे पास भी थोड़े ही | फिर भी ले जा बच्चे भूखे हैं तेरे | उसने पावभर चावल दे दिए | मोहिनी ने चावल का मांड सुबह के लिए और चावल दोपहर के लिए तैयार कर लिए | अब शाम ? बड़ा प्रश्न मुँह बाए खड़ा हो गया | वह सोचने लगी भूख तो अपनी टेम पर लग ही आती है| इसे क्या पता कि कमाई है या नहीं |

कल बेहतर होगा ......




वह देखो ! पूरब दिशा से धीरे –धीरे रात पर से  काली कम्बल उघाड़ती हुई  लालिमा लिए रवि की सवारी आ रही है | नींद दबे पाँव भागने लगी तो जीवन दौड़ने लगा | मानो सूरज ठेकेदार ने सबको अपना काम समझा दिया हो |
अरे बिट्टू जल्दी करो मुझे देर हो रही है, बीनू ने कहा | माँ हमें ही देर क्यों होती है ? उसके गोलमटोल रुई के से फाये गालों को छूकर मैंने कहा क्योंकि तुम जल्दी तैयार नहीं होती  हो | ओह! मम्मी सॉरी | मैं  कल जल्दी उठूँगी| हाँ बेटा देखो सूर्य कभी देर नहीं करता | एकदम अपने समय पर | हाँ माँ समझ गई | बीनू बेटी को समय और अनुशासन समझाते – समझाते उसे स्कूल छोड़ आई | अपने पल्लू से माथे पर छलक आए पसीने को पोंछा और सोचने लगी कितना गुस्से में है सूर्यदेव|
दिन तो समय के पहिए लगाए अपनी गति से बढ़ने लगा | दफ़्तर के दरवाजे पर रिश्वत के नजराने शुरू हुए |चपरासी से बॉस तक ओहदे के हिसाब से वजन बढ़ने लगा | सूरज ने अस्पताल से गुजरते खिड़की से झाँका तो ... बीमार डॉक्टर की प्रतीक्षा में पलकें बिछाए बैठे हैं, लेकिन डॉक्टर बाबू को तो पहले उन्हें देखना है जिसने उनका पर्स गरम किया है| इन्हें क्या है ,यहीं पड़े रहेंगे | सूरज का दिल घबराने लगा, उसका चेहरा तमतमाने लगा और वह आकाश के चौराहे पर खड़ा देखने लगा |
कितनी मासूम,जवान और बूढी निगाहें जज साहब की ओर न्याय की फ़रियाद में उठीं किन्तु न्याय के तराजू में तो नोटों का चुंबक चिपक चुका था| पलड़ा झुक गया ......|
अब तो सूरज भी थक गया था , अपने पैर घसीटते हुए भागने लगा बेदम | भागते – भागते पैर छिल गए | चेहरे पर खून उतर आया, हताश , निराश सा लटक गया क्षितिज पर और धीरे – धीरे डूबने लगा पश्चिम के पैमाने में | फिर आने की आशा में कि कल आज सा नहीं होगा, आज सा नहीं होगा आज सा ......|

एक आकांक्षा


गुड मॉर्निंग मैडम | गुड मॉनिंग | नमस्ते सर , नमस्ते-नमस्ते | इस प्रकार अभिनंदन स्वीकार करती हुई ताज़गी भरी मुस्कान लिए आकांक्षा प्रार्थना सभा की ओर जा रही थी | प्रार्थना सभा में कुछ बच्चों का राष्ट्रीय गीत लापरवाही से गाना उसे कभी अच्छा नहीं लगता | सोचती इस ‘वंदेमातरम’ ने देश में आजादी का अलख जगाया था,यह जागरण की प्रभात फेरी हुआ करता था,जिसने सारे देश को एकता के सूत्र में पिरोया था |यह आज हम भूलते जा रहे हैं | खैर सम्मान की भावना तो मन से आती है जोर जबरदस्ती से नहीं | प्रार्थना सभा हो चुकी थी | सभी छात्र  अपनी –अपनी कक्षाओं में चले गए | रजिस्टर और किताबें लेकर मिसेस आकांक्षा  ने भी कक्षा में प्रवेश किया | नमस्ते बच्चो! नमस्ते मैम |
आज हम क्या पढेंगे ? मैम पहले वाला चैप्टर तो पूरा हुआ ही नहीं | क्यों उसे तो हमने पढ़ लिया है | कहाँ था आपका ध्यान ? आकांक्षा ने कहा | अरे मैम मैं तो उस दिन आया ही नहीं था | क्यों ? वो ... पार्टी में देर हो गई  थी, इसलिए  सोता रहा | राहुल ने कहा | राहुल पार्टी तो ठीक है किंतु आपको  पढ़ाई पर भी ध्यान देना चाहिए  | पहले पाठ पढ़ लीजिए फिर आपकी सहायता करुँगी | लेकिन पढ़ने की जरुरत ही क्या है मैडम  बस प्रश्नोत्तर दे दीजिए शेखर ने अंगड़ाई लेते हुए कहा |
आकांक्षा कक्षा में आए बदलाव तथा  दिन पर दिन गिरते अनुशासन से पहले ही खफ़ा थी , आज तो उनका पारा चढ़ गया था | आप लोग पढ़ाई को समझते क्या हो ? शिक्षा प्राप्त करने का मतलब यह नहीं कि स्कूल में हाजरी पड़ जाए और रट्टा मारकर परीक्षा पास कर लें | माता-पिता की  जिस आशा से आते हो न तुम !.... मिसेस  आकांक्षा कुछ कहती कि घंटी बज उठी टर्न ... टर्न ..| वह खिन्न मन से पैर पटकती हुई कक्षा से बाहर आ गई | हाय ! नीरू  , हाय मैम | क्या आपका लीजर है अभी ? हाँ जी | चलो न चाय पीकर आते हैं | क्या बात है मैम बड़ी परेशान नजर आ रही हैं चाय का प्याला लेते हुए आखिर नीरू  ने पूछ ही लिया | हाँ आजकल पढ़ाने का बिलकुल मन नहीं करता , देखती नहीं हो बच्चे कैसे नोट्स की माँग करते हैं | कुछ समझना ही नहीं चाहते, स्वाध्ययन तो दूर की बात है | आखिर यह पीढ़ी कहाँ जाएगी?
मैम यह तो फैशन हो गया है | डोनेशन दे दो,दाखिला ले लो | करना क्या है, अंग्रेजी आ जाए,चटर – पटर , कम्प्यूटर कोर्स कर लो और क्या चाहिए ?
आज पूरा दिन आकांक्षा का मन नहीं लगा | बस आने वाली पीढ़ी और उसका आलस | यही सब सोचने में बीत गया |छुट्टी की घंटी कब बजी पता ही नहीं चला ,पर्स उठाया और घर चल दी | सिर दर्द से फटा जा रहा था | मुँह धोया एक कप गरमागरम चाय पी और अखबार उठाया आज तो अखबार भी नहीं देखा वह मन ही मन बुदबुदाई | लिच्छवी  आ चुकी थी | बीबीजी का बनाएँ, कुछ भी बना दो उसने अनमने मन से कहा | कुछ भी का मतलब का  होवत है ? किती बार कह रही मुँह पीरा (पीला) पड़ गया है तनिक खुली हवा में साँस ले लिया करो | आई तब गुलाबी रंग था, चेहरे का | हमको समझत नहीं आवे कि सारा दिन किताब ,पन्नों में का करत हो तुम | बोलते-बोलते लिच्छवी बैठ गई |
यह उसके रोज की उपदेश माला थी | जब तक वह मुझे सीख न दे दे तब तक वह कोई काम  शुरू नहीं करती | बस हो गया या अब और कुछ कहना बाकी है | हमको का कहना है बीबीजी ? बस सोच रहे ऐसे  कैसे  चलेगा ? पहाड़ सी जिंदगानी और चारो तरफ काले कोबरे | बस तोहार नमक खाया है , कह देते हैं  | तुम जैसे मेम साहब को हम का सीख देबे लगे |
अरे! छोड़ इन बातों को , बता तुमने पढ़ना शुरू किया कि नहीं | यह सुनकर उसके मुँह पर ताला लग गया | घायल हिरणी सी इधर-उधर देखने लगी| अरे! क्या हुआ ? ऊ दीदी बात ई है, कि हमार मरद ने तख्ती उठा के फैंक दी और कहत रहा कि बेसरम ई उमर मां सलेट लेती है ? ई नाटक-वाटक हमरे ईहाँ ना चली | तोहार काम है खाना बनाना और हमार मुनवा का धियान रखना बस | ईं सब बातन के अलावा ईहाँ तोहार कछु काम नाहीं समझी |
    ओफ्फो ! तुम यहाँ काम करती हो , सेठजी के यहाँ काम करती हो , कमा कर देती हो  फिर भी तेरे साथ ऐसा व्यवहार | घरों में काम करना बंद कर | अपने बच्चे का ध्यान रख और थोड़ा समय निकाल कर पढ़ना सीख| आकांक्षा ने समझाया | इतना सुनते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया , उदास हो गई वह | क्यों क्या हुआ ? ऐसा क्या कहा दिया मैंने ? बीबीजी बात ई है , वो बात ई है कि हमार मरद को पीने को दारू चाहे और ना मिले तो हमार जीना मुस्किल कहते – कहते उसका पल्लू सरक गया | कंधे पर नीली – नीली धारियाँ| उफ़ ! यह क्या है , कछु नाहीं बस ये तो ....औरत जात होने की सजा है | बीबीजी और कछु नाहीं | जल्दी से उठ  तत्परता से काम में जुट गई जैसे कुछ हुआ ही न हो | हम २१वीं सदी  में जी रहे हैं | एक तरफ स्त्री अंतरिक्ष में कदम धर चुकी हैं, एवरेस्ट पर परचम लहरा चुकी हैं तो दूसरी ओर लिच्छवी जैसी औरतें आदम ज़माने में जीने को बाध्य हैं| आकांक्षा ने किताबों को उठा कर रखा, बिखरे बालों का जुड़ा बनाया और किचन की ओर बढ़ गई | अब तक लिच्छवी जा चुकी थी और मैं सोचती रह गई | स्त्री होने का मतलब क्या यही है ? काम करो, अपमान सहो, मार खाओ और फिर इन सब को किस्मत का जामा पहनाकर सब भूल जाओ |
घड़ी ने चार बजने की सूचना दी | आकांक्षा झट से उठी , ईश्वर की आराधना की कि हे ईश्वर आज का दिन अच्छा हो | मन की शक्ति देना, मन विजय करें .... ये पंक्तियाँ कानों में गूंज रही थी | अद्भुत शक्ति उसे आगे बढ़ा रही थी | आकांक्षा आश्वस्त थी | आज वह किसी भी घटना से विचलित नहीं होगी, हतोत्साहित नहीं होगी बल्कि कुछ ऐसे प्रयास करेगी जिससे भटके हुए बच्चों को राह दिखाएगी, वातावरण को अच्छा करेगी | बस के साथ ही विचारों की यात्रा अविरल गति से चल पड़ी थी | रोजाना की तरह सब कुछ समान ही था | कक्षा में दाखिल होते ही आकांक्षा ने चहक कर कहा | बच्चो ! आज हम राजा शिवी और दधिची के बारे में जानेंगे|  पक्षी के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं का मांस देने के लिए तैयार हो गए थे राजा शिवी | अच्छा तो बताइए कि इस प्रसंग से हमें क्या प्रेरणा मिलती है ? आराधना ने कहा मैडम, परोपकार करना चाहिए | शाबाश ! यश आपने क्या सीखा ? मैडम राजा को ज्ञान नहीं था| एक कबूतर की जान बचाने के लिए  खुद की जान जोखिम में डालना कहाँ की अकलमंदी है? और कक्षा  हँस पड़ी | आकांक्षा ने जान लिया था कि कहीं कुछ घट रहा है जो इन बच्चों को प्रेम,अहिंसा,त्याग जैसे मूल्यों  से दूर ले जा रहा है | वह मन ही मन दिखावे की संस्कृति को कोसने लगी | यह संस्कृति तो बच्चों के भावी जीवन को खोखला कर देगी | जंक फूड जोंक की तरह चिपक गया है इनके दिमांक में | इसी उधेड़बुन में दिन बीतते रहे | आज समाचार देखकर उसकी रूह काँप गई| दिल्ली में घटी घटना से वह पगला गई | सभी अपना क्षोभ व्यक्त कर रहे थे | आए दिन ऐसी घटनाएँ घट रही हैं उसके मूल में शिक्षा की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिह्न लग गए हैं| हम  भूमंडलीकरण के इस दौर से गुजर रहे हैं, ग्लोबल वार्मिंग की चिंता जता रहे हैं लेकिन क्या अपने पैरों में लगी आग दिखाई नहीं देती | हाँ आप बिलकुल ठीक कह रही हैं आकांक्षा जी | मि. रघु ने कहा | सचमुच माहोल गलीच हो गया है नहीं मिस आरिफा ने कहा | हाँ यह सब हो रहा है किन्तु क्या हम यूँ ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे ? मि. कुलकर्णी बोले अरे ! मैडम यह सब ऐसा ही चलता रहेगा | आप क्यों इतना टेंशन लेती हैं हम आ रहे हैं,पोर्शन करा रहे हैं और क्या कर सकते हैं, ट्यूशन दे रहे हैं | बच्चे पास हो रहे हैं ना! ये अब उनकी किस्मत है कि वे क्या बने कैसे बने ?  
अरे ! इसका मतलब कुछ आदर्श नहीं सब प्रैक्टिकल, कोरा प्रैक्टिकल हो गया है | ये क्यों भूल जाते हैं कि समाज में यदि कुछ है तो वह आदर्श ही है अन्यथा कोरी व्यवहारिकता ने तो समाज को डुबाया ही है| हमारा कर्तव्य है कि बच्चों में संस्कार का बीज बोएं | ‘गुरु कुम्हार है, शिष्य कुंभ’ ये याद रखना होगा | आकांक्षा ने मन ही मन ठान लिया था हमें ही भटकों को रास्ता दिखाना होगा, हमें ही कुछ  करना होगा....|
आखिर मन में एक आकांक्षा है जो , मन में संकल्प , एक विश्वास लेकर बुदबुदाने लगी ---
  होकर मायूस यों न शाम सा ढलते रहिए |
  ज़िंदगी भोर है एक, सूरज सा निकलते रहिए ||
इन पक्तियों को गुनगुनाती वह चल पड़ी ....| आकांक्षा को पूरी करने |


डॉ. मंजु शर्मा,
अलवाल, हैदराबाद |





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