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Sunday, April 12, 2020

नासिरा शर्मा का उपन्यास ‘पारिजात’ : सांस्कृतिक संदर्भ



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‘पारिजात’ सपनों की सौगात, गंगा जमुनी तहज़ीब का अनोखा संगम।  ‘पारिजात’ इतिहास के झरोखों से झाँकता  है, तो आधुनिक चिंतन व भविष्य को तलाशता भी है।  ‘पारिजात’ की ख़ास विशेषता यह भी  है कि उसका फूल उसके नीचे नहीं बल्कि उससे दूर गिरता है।  पारिजात एक दुर्लभ पुष्प है।  जोसूखकर भी अपनी सुरभि से सबको सुवासित करता रहता है। एकओर उपन्यास  पारिजात अपनी हिन्दू मुस्लिम संस्कृति के मेलजोल का प्रतीक है जो अनेक अलगाववादी विचारधाराओं के बावजूद अपनी एकता कायम रखे है। तो दूसरीओर  वह एक मासूम नन्हीं सी जान पारिजातहै(रोहनका बेटा) है जो अपनों से दूर कहीं और महक रहा है जिसे पाने की एक कसक है।  एक छटपटाहट है जोअंत तक बनी रहती है।  पारिजात में दो माँओं का भिन्न रूप सामने आता है।  एक माँ अपने युवा बेटे रोहन को भी अपने पास आँचल की छाँव में रखना चाहती है, तो दूसरी (रोहन की पत्नी एलेसन) अपने छोटे से बच्चे को भी प्रशिक्षण के ढाँचे में ढाल उसे ट्रेंड करना चाहती है।  “वह बीमार टेसू को छोड़कर लेट नाइट पार्टियों में वक्त गुजारती है। ”(244)एक के पास ममता का अथाह सागर हिलोरें  ले रहा है, तो दूसरी तरफ आधुनिकता की अंधी दौड़ में ममता सूख गई है। यहाँ लेखिका ने पाश्चात्य तथा भारतीय स्त्री की तुलना की है । जैसा कि विदित है भारतीय स्त्री अपनी सन्तान के पालन पोषण में अपना सर्वस्व लगा देती हैं।  यहाँ देने का भाव प्रबल है भोगने का नहीं।  वहाँ केवल महत्वाकांक्षा है।  पारिजात में पूर्व और पश्चिम की तुलना है तो दो संस्कृतियों का संगम भी है।  एक तरफ इलाहाबादी मेला तो दूसरी तरफ लखनऊ में दशहरे की झाँकी।  यहाँ धार्मिक समुदायों से ऊपर मानव संस्कृतियों का मेल है।  जो मनुष्ता की जीवंतता का प्रमाण है।
वर्तमान युग में सांस्कृतिक और धार्मिक परिवेश लुप्त होने के कगार पर है।  ऐसे में धर्म, संस्कृति, हुसैनी ब्राह्मणों की गाथाओं के साथ इतिहास ज्ञान – विज्ञान का परिचय देकर  लेखिका ने इनसे वंचित होती नई पीढ़ी के लिए श्रेयस्कर कार्य किया है।
नासिरा शर्मा ने भारतीय संस्कृति में व्याप्त गुरु एवं शिष्य सम्बंधों की प्रगाढ़ता को भी निखिल और प्रहलाद दत्त के माध्यम से सराहनीय भावाभिव्यक्ति दी है।  वह सराहनीय है। शिष्य अपने गुरु के प्रति चिंतित है।  गुरु की महत्ता शिष्य के लिए बड़ी अहम होती है उसे बताया नहीं जा सकता बस सहेजा जाता है , महसूस किया जा सकता है।  कबीर की उक्ति यहाँ परिलक्षित होती है कि गुरु गुण लिखा न जाए ....“आप लोग इसी वक्त मेरे साथ चलेंगे।  जहाँ मैं आपकी देखभाल कर सकूँ और मेडिकल सहूलियतें हों। ” “सर, आपका ठीक रहना हालात की माँग भी है और आप जैसे प्रोफ़ेसर की हमको सख्त्त जरुरत है।  आप क्या हैं हमारे लिए आपको अंदाज़ा है? उठिए चलकर कार में बैठिए। ” (29) शिष्य के इस प्रेम पर गुरु मोहित भी है तो चिंतित भी  “यह रिश्ता भी अजीब है,द्रोणाचार्य और एकलव्य का।  दिल से जिसको गुरु मान लिया, उसके लिए अंगूठा क्या, कुछ भी कुर्बान किया जा सकता है।  मैंने अपनी परेशानियों का बोझ न चाहने के बावजूद काफी हद तक निखिल के कंधों पर डाल दिया है।  उन्होंने गहरी साँस ली और आँखे बंद कर लीं। (36) गुरु को अपने शिष्यों पर गर्व भी होता है।  प्रहलाद दत्त ने निखिल को गहरी नजरों  से देखा मानों कह रहे हों –“तुम मेरी कमाईहुई दौलत हो।  हर अध्यापक का खज़ानादरअसल उसके विद्यार्थी होते हैं।  हम करोड़ों के मालिक हैं।  देश-विदेश,गाँव-शहर, हर जगह हमारा सिक्का चलता है। ”(442) साथ ही साथ उपन्यास में कई ऐसे मुँह बोले, जाने - अनजाने रिश्ते अनेक पात्रों के माध्यम से आए हैं, जो खून के रिश्तों  से कहीं ज्यादा अपनत्व,ममत्व और आत्मीयता को महत्व देते हैं।  ऐसे पात्र  आज  रिश्तों की सूखती धरती पर सम्वेदनाओं की वर्षा कर पाठक को अपनत्व और जिम्मेदारी के अहसास से सराबोर करते हैं।  ऐसा ही एक पात्र है ‘अन्ना बुआ’ जो लेखिका की लगभग सभी रचनाओं में नाम बदलकर किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है।  और वफ़ादारी का बेजोड़ सबूत है।  “इस घर में बड़ी बरकत है।  सारे  दुःख उड़न छू हो जाएँगे।  फिर अच्छे दिन लौट आएँगे। ” अन्ना बुआ ने तसल्ली दी। (199)किस्सागोई में अनुभव हों या फिर चुड़ैल, डोमनी की कहानी इनकी जुबान से झरकर दूसरों तक पहुँचते  हैं।
पारिजात में ‘मर्सिया’ के विविधपक्षों पर लिखा गया। बुराई पर अच्छाई को इतिहास के पन्नों पर उकेरा है और बताया गया है कि “यही मर्सिया, जो मजहब से नहीं, इंसानी जज्बे से ताल्लुक रखता है। मर्सिया इंसानी अहसास का नाम है”(113)
1.“एक पाकीज़गी -भरी उदासी, जो अपने में अनुशासन लिए हुए थी, अजीब गरिमा-सी वातावरण को बख्श रही थी।
               वह गर्मियों के दिन वह पहाड़ों की रहे सख्त,
                पानी न मंजिलों न खिन साया - ए – दरख्त,
                डूबे हुए पसीनों में है गाजियों के रख्त,
                संवला गए हैं रंगे जवानानें नेक बख्त। ”, (76)

2. “क्या अश्किया थे जिनको न आया तरस ज़रा
   आया तो तीर छिद गया मासूम का गला।
                 नन्हीं - सी जान ख़ुल्द को पर्वाज़ कर गई,
                 मौला तड़पके रह गए दुनिया बिखर गई।
इस मिसरे को सुनकर रोहन को टेसू (बेटे) की याद की टीस उठती है।

3.गिरकर कभी उठे,कभी रखा ज़मीं पे सर
उगला कभी लहू तो सँबरची के फल गिरे भाला कभी जिगर
   हसरत से की खियाम की जानिब कभी नज़र
   करवट कभी तड़प के इधर ली कभी उधर
उठ बैठे जब तो ज़ख्मों सेबरछी के फल गिरे
तीर और तन में गड़ गए जब मुँह के बल  गिरे (114)

मर्सियों के अनेक उदाहरण देकर लेखिका ने उनके महत्व को रेखांकित बताया है किंतु मर्सियों का अधिक वर्णन कहानी पर हावी होकरउसे बोझिल बना देता है।

पारिजात के पन्नों में झिलमिलाता है इतिहास का धुंधलाता लखनऊ।
रोहनरिक्शा लेता है लखनऊ जाने के लिए।  रिक्शेवाला  लखनऊ की बदली फिजाओं और बदले रूप के बारे में बताने लगा ---
“कहते हैं, पहले लखनऊ बागों का शहर था।  आराम बाग़,निशात बाग़,आलम बाग़, सुंदर बाग़, बंदरिया बाग़,नज़रबंद बाग़, ऐश बाग़,-- अब तो बाग़ नहीं भवन भरमार हो रही है।  भरी सड़कें दिख रही हैं।  रिक्शा चलाय का मजा छूमंतर हो गया है।  पहले गलियाँ थी पतली,फ़क़त घोड़ा गाड़ी जाने या डोली के गुजरे भर की, मगर सुना साफ चिकनी रोशनी वाली थीं।  पूरा लखनऊ का मनई इस गली से उस गली तक पहुँच लेता था,मगर अब तो दिल ऐसा छोटा होय गवा है कि ओमा हाथी की सूँड न समाए। ” (84)
रोहन लखनऊ सेइतना प्रभावित हुआ कि वह चहक उठा --
“ आसमान पर चाँद निकल आया था।  उसकी चाँदनी में लखनऊ के कई जमे गुंबद और बूढ़े खिड़की - दरवाज़े उसे परीकथा के देश जैसे लगे।  उसने हँसकर चाँदनी से आँखमिचौली खेलते अँधेरे को ताका और कह उठा, “इलाहाबाद एक हकीकत है और लखनऊ एक ख़्वाब। ”(107)
प्राय: आधुनिकता के नाम पर लोग अपने संस्कारों जिम्मेदारियों को ताक पर रख देते हैं।  जो जितना फूहड़ और स्वार्थी होता है, उतना स्वयं को आधुनिक मानने की होड़ में लगा रहता है। उपन्यास की नायिका रूही आधुनिकस्त्री  होने के बावजूद अपने संस्कारों को नहीं छोड़ती।  संस्कारशील रूही अपने पति की मृत्यु के बाद भी जिम्मेदारियों से मुँह नहीं मोड़ती।  “यतीमखाने का बुरा हाल है, पता नहीं सालाना इमदाद का रुपया जाता कहाँ है।  मुझे तो लगता है कि पैसा मैं तभी ट्रस्ट में दूंगी, जब उनकी रिपोर्ट और काम देख लूँगी।  मुझे ही यह जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी,वर्ना जिसकी ड्यूटीलगाऊँगी वह भी कमीशन ले, इन लावारिस बच्चों के हक़ में हिस्साबँटा लेगा। ”(259)
फिरदौस जहाँ  इतिहास और हकीकत की ऊहापोह में है।  वह अपनी बेटी रूही  को अपने ज़माने की एक-एक चीज बताना चाहती है।  बदलते परिवेश तथा दूर होते अपनेपन को इतनी शिद्दत से बयां  करना चाहती है कि  आने वाली पीढ़ी उसके अतीत के जर्रे -जर्रे से वाकिफ़ हो सके .....
“अकबरी दरवाज़ाआज भी मेरी यादों में अपनी सारी सजधज के साथ मौजूद है, जहाँ अंदर की तरफ जाने वाली गली की दोनों तरफ़ की दुकानें मिटटी के खिलौनों से भरी थीं।  फल,सब्जी,सूखे मेवे,जिन्हें मिटटी की तश्तरी में रंग-सजा देखकर असल का गुमान होता था।  यही नहीं, वहां मेहतर और भिश्ती भी हुआ करते थे।
मुजरे करती तवायफें और उसके साथ बैठे साजिंदे।  तवायफ की पेशवाज़ का घुमाव क्या ग़ज़ब का था ! बचपन का देखा वह बाज़ार मेरे ख़्वाबों में कैसा जी उठा है, यह तुम्हें कैसे बताऊँ मेरी बच्ची!” (139)
लेखिका पत्रों के बहाने अपनी बेटी को लखनऊ की तहज़ीब और उसके इंसानी जज्बातों से रूबरू करना चाहती है यही कारण है कि वह  कोई ऐसी चीज नहीं छोड़ना चाहती जिससे रूही या फिर  युवा पीढ़ी उससे वंचित रह सके – “मेरे बचपन के बहाने पुराने लखनऊ को जानोगी लखनऊ में तमीज़ व तहज़ीब दौलत और मरतबे में नहीं बँटी थी।  इस खबी से क्या अमीर,क्या गरीब, लखनऊ का हर तबका मालामाल था। ”(142)
आधुनिकता और अमीरी-गरीबी की खाई लोगों या मनुष्यता केबीच गहराती रही है हम बात करते हैं ग्लोबोलाइजेशन की।  इस बदलाव पर लेखिका ने कहा है – “पहले झुग्गी-झोंपड़ी स्लम एरिया की तरह नहीं होती थी, बल्कि सब एक ज़मीन पर साथ-साथ रहते थे।  गरीब अपनी गरीबी में रूहानी ताकत से अपने दायरे में रूखा-सूखा खाकर  जीता था तो अमीर अपने दिखावे और आरामतलबी में।  मगर एक मुकाम ऐसा था, जहाँ दोनों तबके इंसान बनकर एक दूसरे के दुःख दर्द को समझते थे तभी तो रिश्ते पीढ़ियों तक चलते ... सबबीत गई। ”(143)
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि ‘पारिजात’ नि:संदेह साहित्य अकादमी सम्मान की कसौटी पर खरा उतरता है। 500 पृष्ठोंमें गंगा-जमुनी तहजीब से सराबोर है यह  उपन्यास।  सांस्कृतिक एकता के इतिहास में भारत का अग्रणी रहना सही है।  लेखिका ने इस बात बखूबी कहा  है।  इसमें भारत के युवाओं का ऐसा चेहरा सामने आता है जो अपनी जड़ों के कटने के बाद अपने बिखरे अस्तित्व को तलाशते नजर आते हैं।  नासिरा शर्मा ने आज की पीढ़ी के सपने, उसके निर्णय और उसकी घायल संवेदनाओं को तर्कों के साथ बयां किया है।


‘नासिरा शर्मा के उपन्यास ‘कुइंयाजान’ में पर्यावरण विमर्श’




नासिरा शर्मा Nasira Sharma | Indian literature ...
                                                 

इक्सवीं शताब्दी में साहित्य के सरोकारों का जो नया विस्तार हुआ है | उसके परिणामस्वरूप पिछली शताब्दी तक हाशिए पर रहे कई प्रश्न अब केंद्र में आ गए हैं | कुछ समय पहले तक पर्यावरण से जुड़े मुद्दे उतने महत्वपूर्ण नहीं थे जितने वे आज हो गए हैं दरअसल विकास और प्रगति की अंधी दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति और पर्यावरण का दोहन तो किया लेकिन उसकी क्षतिपूर्ति के बारे में लंबे समय तक बिल्कुल नहीं सोचा | अब क्योंकि पर्यावरण प्रदूषण के कारण पृथ्वी और मनुष्य का अस्तित्व ही खतरे में पड़ता दिखाई देने लगा है तो समाज ने पर्यावरण को बचाने के बारे में सोचना शुरू किया है | यही वह बिंदु है जहाँ से पर्यावरण विमर्श की शुरुआत होती है | कल तक उपेक्षित रहा पर्यावरण आज मनुष्य के अस्तित्व के साथ जुड़ जाने के कारण अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय हो गया है |
पर्यावरण चेता साहित्यकार इसलिए विभिन्न विधाओं के माध्यम से समाज को चेतावनी दे रहे हैं और इस दिशा में सक्रीय होने के लिए प्रेरित कर रहे हैं|
हिंदी की वरिष्ठ कथाकार नासिरा शर्मा ने अपने उपन्यास कुइंयाजान (२००५) में जल से जुड़ी पर्यावरण चेतना को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की है | नगरीकरण और औद्योगिककरण ने प्रकृति के इस तत्व को किस प्रकार दुर्लभ तत्व बना दिया है यह विचारणीय विषय है | उपन्यास में पंडित जी इसी चिंता को व्यक्त करते हुए कहते हैं ......
“घरों में हैंडपाइप थे, खराब पड़े थे | पानी की हाय-तौबा मची थी | शिव मंदिर के पुजारी भी बिना नहाए परेशान बैठे थे | नल की टोंटी पर कई बार कौआ पानी की तलाश में आ-आकर बैठ-उड़ चुका था | गर्मी ऐसी कि पसीना पानी की तरह शरीर से बह रहा था | पंडित जी नल खोलते, फिर बंद कर बडबडा उठते, “पग-पग रोटी, डग-डग नीर ... मगर अब ...ई शहर का कईसा हाल बना  दिए हो भगवान | न पानी न रोटी !”(11)

जल और जीवन अन्योनाश्रित है | नासिरा शर्मा द्वारा रचित उपन्यास ‘कुइंयाजन’ जल का आधार खोजती रचना है | पानी चंचल है मन की तरह | मन की हलचल में जीवन की सहजता विद्यमान है | जल सूखा तो मन सूखा और मन सूखा तो सब सूखा अर्थात नीरस जीवन | कुइंयाजान की धूरी जल  है | जिसके इर्द-गिर्द बावर्चीखाने से लेकर श्मशान तक के अंतर्मन की व्यथा-गाथा  घूमती रहती है | जल केंद्र में है | मनुष्य का जीवनाधार पानी है | इस उपन्यास में लेखिका ने जल संकट की भयावता से आगाह किया है | संस्कृत ग्रन्थ, राजस्थानी लोक जीवन की कथाओं  जैसे ढोला - मारू द्वारा यह प्रमाणित किया है  कि हमारे देश में जल की कमी नहीं है | अपनी इसी जिजीविषा के चलते मनुष्य जल संरक्षण करता आया है | बड़ी-बड़ी बावड़ी कुएँ ताल- तलैए इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं |किंतु आज यही विषय सोचनीय हो गया है , क्योंकि जब से मनुष्य परंपरागत जल स्रोतों की  उपेक्षा करने लगा है तब से ही प्रकृति में असंतुलन आ गया है | पानी का संकटचरों ओर मंडरा रहा  है | गंगा का पानी सूखता जा रहा है | जल संकट आज गंभीर समस्या बन गया है | जल संकट की जड़ की ओर संकेत करते हुए लेखिक कहती है ... “यह बड़ी खतरनाक समस्या हमारे सामने आ खड़ी हुई है| इसके प्रति आम लोगों में जागृति बहुत जरुरी है| वरना यह पानी भी दूध के भाव बिकेगा और एक ऐसा समय आएगा जब अपनी ही नदियों का पानी पीना, वह भी खरीदकर, बहुत बड़ी अय्याशी समझा जाएगा |” (103)
विज्ञान के आविष्कारों ने नि:संदेह अनेक चमत्कार किए हैं , अनेक सुख -सुविधाओं की चादर बिछाई है किंतु भोग-विलास की इस तृष्णा को पूरा करने में मनुष्य ने प्रकृति के साथ शत्रुता का सा व्यवहार कर उसका दोहन इस कदर किया है कि प्रकृति  विकराल रूप धारण कर रही है यही कारण है कि बाढ़ , तूफ़ान बिन मौसम की बरसातें  सब अनचाहा हो रहा है प्रकृति का सुखद सुंदर रूप विकृत होता जा रहा है |प्रकृति को अपने रूप में लाने के लिए हमें अपनी जीवनशैली बदलनी होगी  नासिरा शर्मा कहती हैं कि...
“अगर कुदरत से इंसान दोस्ती रखे तो वह अपना पूरा सहयोग देती है |” (308)
जल है तो कल है यह हम क्यों भूलते जा रहे हैं | रचनाकार ने प्रकृति और जंतुओं को जोड़ा है | बिना जल या यो कहें कि शुद्ध साफ जल के कोई भी जी नहीं पाएगा या फिर अनेक रोगों से ग्रस्त होगा ...
“राजस्थान में कई स्थानों पर  या तो  पानी की किल्लत रहती है या फिर गंदा पानी पीने की विवशता है परिणामस्वरूप लोग अनेक बिमारियों के शिकार होते हैं “अतिसार, हैजा, कृमिरोग, पेचिश, मोतीझारा, पीलिया, जुकाम, चर्मरोग, अंधापन, आंत्रशोध, लकवा, नारू,अमिबोविसिस एवं पेट – संबंधी अनेक रोग अशुद्ध जल पीने की देन हैं|”(308)
कुइंयाजान में बार-बार यह विचार उभर कर आता है कि मनुष्य  आधुनिकता बनाम तकनीकी का अंधाधुंध प्रयोग कर क्षण भर की ख़ुशी तो हासिल कर रहा है, पर जीवन भर के गम को दावत भी दे रहा है | फिर बचेगा क्या ? एक नीरस भयावह दृश्य जहाँ मनुष्य की जिजीविषा संघर्ष करने को विवश हो जाएगी ....
“ जब बर्फ गिरना बंद हो जाएगी,  हिमशिखर सफ़ेद से गहरे कत्थई रंग का वस्त्र धारण कर लेंगे, उस समय शोधकर्ता हडप्पा की खुदाई में पाए जाने वाली वस्तुओं की तरह ही पानी के पाए जाने वाले स्थानों पर भी शोध करेंगे, तब सूखी घाटियाँ अपना इतिहास बताएंगी ... देशों में पानी के बंटवारे को लेकर युद्ध की सम्भावनाएं दम तोड़ जाएंगी | चारों ओर शांति होगी – नो पेट्रोल, ना वाटर!”(364)
भविष्य में जल संकट की भयावहता से सतर्क करता है कुइंयाजान | मनुष्य यंत्र चालित होकर आज इतरा रहा है सब कुछ मुट्ठी में कर फूले नहीं समा रहा है किंतु उसे  पता नहीं कि वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है | जिस जीवन के लिए वह इतनी जद्दोजहद कर रहा है वह तो उसकी मुट्ठी से रेत की तरह फिसल रहा है .....
“वनस्पति न उग सकने के कारण बारिश नहीं होगी और जब बारिश नहीं होगी तो पेड़ नहीं उगेंगे | घास भी न होगी जिसे हम चूस सकें, न ओस टपकेगी जिसे हम चाट सकें | हम सिर्फ़ गोली खाएंगे | तरक्की करेंगे| बेहतरीन मशीने बनाएँगे- एक बटन से ज़माने को बदल डालने वाली मशीनें|” (272)
लेखिका ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के स्वार्थ की परत उघाड़ी है | “आज़ादी मिले एक अरसा हो गया, परन्तु स्वच्छ जल सबको बराबर नहीं मिला | उल्टा जिस गुलामी को हमने नकारा था  जल परियोजनाओं के चलते हम फिर उस दासता को स्वीकार कर रहे हैं | बहुराष्ट्रीय कम्पनियां किस तरह अपना उल्लू सीधा कर रही हैं,जब यह षड्यंत्र हमारी समझ में आ रहा है,तो उनकी समझ में क्यों नहीं आ रहा जो ऐसे अनुबंधों पर हस्ताक्षर करते हैं?” (219)
लेखिका ने  पर्यावरणीय असंतुलन की सारी जिम्मेदारी नीति- नियामकों पर नहीं डालतीं   बल्कि  हमारी भूलों की ओर भी  संकेत करती है|  यह भी स्पष्ट किया है कि पर्यावरणीय संकट हमारे किए का नतीजा है | इस रचना का पात्र कमाल सपना देखता है .....
 “उसकी आवाज सुन परिंदे घोसलों में फडफडाने लगते हैं| शाखाएं वेग से हिलने लगती हैं पत्तियाँ देखते ही देखते पेड़ों से  झर-झर गिरने लगती हैं और जंगल सूख जाता है | पत्तियों रहित शाखाओं  पर बैठे परिंदे गा नहीं, बल्कि डर से चीख रहे हैं | नीचे गहरी घाटी है | नदी बहते बहते सूख जाती है ! किनारों पर खड़े पानी पीने आए चौपाए- हाथी, नीलगाय, बारहसिंगा- अपनी-अपनी बोली में प्यास...प्यास चिल्ला रहे हैं| छोटी-बड़ी मछलियां तड़प-तड़प कर पत्थरों  पर सर पटकने लगती हैं!... यहाँ भी पानी नहीं है ...जहाँ जाता हूँ वहाँ सब सूखा मिलता है | कुएँ-कुइंया,पोखर-तालाब, नदी-नाले... |”
लेखिका भविष्य और आने वाली पीढ़ियों के प्रति चिंतित है |    
जाने अनजाने में विकास की नींव ने विनाश को न्योता दिया है | इसके परिणाम भुगतने के लिए पाठकों को आगाह किया है | लेखिका ने अनेक संदर्भों द्वारा बताया है कि हम पानी को लेकर पारम्परिक ज्ञान  भूलते जा रहे हैं | बाढ़ ,सूखा की कथाओं को एक सूत्र में गूँथ पानी के वज़ूद को बताया है |
पर्यावरण के प्रति ‘चेतना’ प्रत्येक व्यक्ति की चेतना होना आवश्यक है | विडम्बना ही है कि जिस देश में पानी और पर्यावरण को आस्था के रूप में देखा जाता है, पूजा जाता है , नदियों को माँ का दर्जा दिया गया है अर्थात प्रकृति के प्रति आदर की भावना बलवती बनी रहे | आज मनुष्य इसी भाव को छोटा और दकियानूसी समझ बैठा है यही कारण है कि मनुष्य जितना बड़ा होता गया, उतना छोटा होता गया है क्योंकि  ‘जल –जीवन’ को भुला बैठा है ऐसे में चाहे कितने भी रोबोट क्लोन जैसे आविष्कार हो जाएँ किंतु पानी का अस्तित्व संकट में रहा तो ये सारी उपलब्धियाँ व्यर्थ हो जाएँगी |
प्राकृतिक जल संपदा के स्रोतों के साथ मानवीय खिलवाड़ क्षणिक सुख तो पहुँचाता है किंतु भावी भीषण आपदाओं को आमंत्रित करता है जो तीसरे विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार कर सकता है |
यह रचना यथार्थ के धरातल पर रची गई है | लेखिका ने विचार और वर्णन के सुई धागे से संवेदना का ऐसा ताना – बाना बुना है जो कठिन भी है तो सराहनीय भी है |

 डॉ. मंजु शर्मा,
अध्यक्ष (हिंदी विभाग )
चिरेक इंटरनेशन स्कूल, हैदराबाद | (500084)


          









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