Saturday, April 11, 2020

बेटी बचाओ ... किस किस से , कहाँ-कहाँ ...?




हाँ बेटी बचाओ ! बेटी बचाओ !  समाज के हर तबके से | आए दिन किसी की बेटी,बहन पत्नी सभी तो भूखे भेडियों का शिकार हो रही हैं  | स्त्री जाति उम्र, अवस्था किसी भी पड़ाव पर वह पूरी तरह असुरक्षित है | आज ‘बेटी बचाओ युक्ति बेमानी  सी हो गई है | यह घृणित कार्य समाज की संकीर्ण मानसिकता को द्योतक है वहीँ प्रशासन की ढीली व्यवस्था का परिणाम भी | नैतिकता पर काई लग रही है | इस सड़ांध का इलाज हर घर की दहलीज से शुरू होना जरुरी है | दूसरी ओर अपराधी को कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए | ‘भय बिन होऊ न प्रीति’ | ऐसी  घटनाओं पर चर्चा, पछतावाऔर  हाय तौबा तो बहुत होती है पर कार्यवाही फाइलों तक ही सिमट जाती है | यही कारण है कि ऐसी  वारदातें आम हो गई हैं | बहुत जल्दी ये खबरें बासी हो जाती हैं और फिर वही ढाक के तीन पात | पीड़ित का कष्ट कभी बासी हो पाता है ?
बच्चियों को घर से बाहर भेजने में डर बना रहता है | माँ बाप की सांसे टंगी रहती है जब तक कि लड़की घर सुरक्षित न पहुँच जाए | जघन्य दुष्कर्मियों को कड़ी सजा होनी चाहिए जो औरों के लिए भी सबक बन सके |




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