हाँ बेटी बचाओ ! बेटी बचाओ ! समाज के
हर तबके से | आए दिन किसी की बेटी,बहन पत्नी सभी
तो भूखे भेडियों का शिकार हो रही हैं |
स्त्री जाति उम्र, अवस्था किसी भी पड़ाव पर वह पूरी तरह असुरक्षित है | आज ‘बेटी
बचाओ’ युक्ति बेमानी सी हो गई है | यह घृणित कार्य समाज की संकीर्ण
मानसिकता को द्योतक है वहीँ प्रशासन की ढीली व्यवस्था का परिणाम भी | नैतिकता पर
काई लग रही है | इस सड़ांध का इलाज हर घर की दहलीज से शुरू होना जरुरी है | दूसरी
ओर अपराधी को कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए | ‘भय बिन होऊ न प्रीति’ | ऐसी घटनाओं पर चर्चा, पछतावाऔर हाय तौबा तो बहुत होती है पर कार्यवाही फाइलों
तक ही सिमट जाती है | यही कारण है कि ऐसी
वारदातें आम हो गई हैं | बहुत जल्दी ये खबरें बासी हो जाती हैं और फिर वही
ढाक के तीन पात | पीड़ित का कष्ट कभी बासी हो पाता है ?
बच्चियों को घर से बाहर भेजने में डर बना रहता है | माँ बाप की सांसे टंगी
रहती है जब तक कि लड़की घर सुरक्षित न पहुँच जाए | जघन्य दुष्कर्मियों को कड़ी सजा
होनी चाहिए जो औरों के लिए भी सबक बन सके |
No comments:
Post a Comment