आज तो रविवार है ...हाथ में चाय का प्याला लिए रश्मि बड़े इत्मीनान से चाय पीने के मूड में थी क्योंकि
दफ़्तर पहुँचने की जल्दी तो थी नहीं आज| अन्यथा रोजाना चाय पी थोड़ी जाती है बस गटकी जाती
है | बालकनी में हरे-भरे पौधों के बीच चाय पीना बहुत सुख पहुँचाता है उसे | आज भी
वह ऐसे ही जौली मूड में थी | उसने अखबार
उठाया था कि आँखें दुनियादारी की कारगुजारी को टटोलने लगी | ‘मोमजामे में लिपटा
शिशु’ पढ़ते ही इस तरह उछली मानों बिच्छू ने डंक मारा हो
उसके होठ बुदबुदाए हे भगवान ! फिर वह झल्ला उठी पालना ही नहीं तो आखिर क्यों किसी के अपराधों
की सजा नन्हीं जान भुगते | यदि चूहों या कुत्तों ने उस शिशु को .. बस काँप गई वह ,बदन
सिहर उठा उफ़! रश्मि घृणा और दर्द से तड़प उठी | दोनों हाथों से सर पकड़ लिया | चाय
तो कसैली हो ही चुकी थी | अतीत के पर्दों
से कुछ धुंधलायी सी टीस उठी और वक्त की मुट्ठी से यादें रिसने लगीं |
गंगू ताई एक किशोरी को लेकर रश्मि के घर पहुँची थी
| पान से रंगें होठ फैलाए “मेमसाहब यह किरण है|” गाऊं से काम करने के वास्ते यहाँ
आई है | काम सोब आता है एकदम झकास काम करेगी |ये मेरी गारंटी है | उसने अपने भारी
शरीर को सरकाया और बोली – आठ पढ़ी भी है | चित्रगुप्त की तरह सारा चिठा खोलने के
बाद वहीँ बैठ गई | गंगू ताई का भी जवाब
नहीं फुरसत में होती है तो मुहल्ले की रिपोर्ट ऐसे पेश करती है कि टी.आर.पी. बढ़ाने
वाले चैनलों को भी मात दे | एक कप चाय उदरस्त करने के बाद उसकी जबान धीमी गति के
समाचारों में बदल जाती फिर खुद को ढोती
हुई ओझल हो गई | मेहनतनामा करार होने के बाद किरण ने काम शुरू कर दिया | किरण का
आना एक सुखद एहसास था क्योंकि वह हर काम बड़े सलीके से तो करती ही थी | ईमानदार
इतनी कि चाहे सोना रखा रहे उसकी बला से | धीरे-धीरे उसने सारे काम सीख लिए | समय
की पाबंद इतनी कि घड़ी की सुई के साथ चले | किरण के कदम यौवन की दहलीज पर पड़े ही थे
कि उसका रूप निखरने लगा | काले लम्बे केशों में
गजरा लगाना उसे बहुत प्रिय था | फूलवाले की आवाज पर उसके कान खड़े हो जाते |
उसकी इच्छा देखकर रश्मि ने कई बार उसे गजरा
लेकर दिया था | तब उसके गुलाबी रंग पर हलकी की सी ललाई छा जाती और कृतज्ञता के
उसके हाथ जल्दी-जल्दी चलने लगते | जाते वक्त यही कहती ‘आप बहुत अच्छी हैं’ | रश्मि
प्रत्युत्तर में मुस्कुरा देती | रश्मि को तो उसकी आदत सी पड़ गई थी|
गाँव से
आए हुए किरण को दो वर्ष हो गए थे |अब तो वह थोड़ी थोड़ी अंग्रेजी भी जान गई थी | उसकी मेहनत और अच्छे व्यवहार की
खुशबू कालोनी में फ़ैल गई | इस तरह कई घरों में उसे काम मिल गया | माथे पर बिंदी और
उसके नीचे देवी का कुमकुम लगाना वह कभी
नहीं भूलती | वक्त का पंछी उड़ता चला जा रहा था | धीरे धीरे किरण कमनीय काया पीले भांडे में बदलने लगी | अब उसका गुनगुनाना
मौन हो चला था | उल्लास ने मानो मौन ओढ़ लिया हो | हर जवाब में हूँ हाँ | मुस्कराहट तो कहीं दूर ख़ुशी खोजने चली गई | काम
की व्यस्तताओं के कारण उसके परिवर्तित रूप
पर संदेह तो हुआ पर ध्यान ही नहीं दिया| वैसे भी शहरों में किसी के पर्सनल जीवन में झाँकने को फूहड़ता का परिचायक माना जाता है आखिर वह
नौकरानी ही तो है |
कई दिनों से किरण आई नहीं | रश्मि को यह अच्छा
नहीं लगा | वह सोचने लगी - सारा काम पसरा पड़ा है और कल तो मेहमानों को भी आमंत्रित
किया है और कुढ़ने लगी वह | ये लोग होते ही ऐसे हैं जरा सा काम ज्यादा क्या मिल गया
बस काम चोरी शुरू | हाथी के दांत खाने के
और दिखाने के और | रश्मि झुंझला उठी |
उसका ध्यान फोन पर गया और झट से फ्लेट
नंबर २०९ में फोन लगाया | हैलो आंटी क्या
रश्मि आई आपके यहाँ | जवाब आया नहीं भई मैं भी उस महारानी का ही इन्तजार कर रही
हूँ | दो महीने का एडवांस भी दे दिया है | जी अच्छा | रश्मि किरण के न आने से दुखी
जरुर थी पर वह उसकी बुराई नहीं सुन सकती थी | अब उसका माथा ठनका | आखिर क्या हुआ
होगा | उसका सिर झन्ना उठा | टिनटिन की
दरवाजे पर दस्तक | रश्मि लपकी कि किरण ही आई होगी लेकिन पड़ोस से मिसेज
वर्मा ने गृहप्रवेश किया, लो आसमान से गिरे खजूर में अटके | अब तो एक दो घंटा
चुगली की वेदी पर होम हुआ ही मानिए|
रश्मि ने जबरदस्ती में हाथ जोड़ अभिवादन किया |
वे दांत दिखाते हुए सोफे पर पसर गईं| मैं
चाय लाती हूँ आप बैठिए कहकर रश्मि रसोई की तरफ मुड़ी | चाय का पतीला चढ़ाया | मन रह-रह कर किरण के बारे
में सोच रहा था | मिसेज वर्मा ने चाय का
प्याला थामते हुए कहा जानती हैं, मोहल्ले में आपकी किरण का उजास ही उजास है |
रश्मि का मुँह खुला रह गया किरण का ? और
नहीं तो क्या | उन्होंने जोर से चाय सुड़की | और धीमे से कहने लगी अरे वह तो पेट से
है | रश्मि के पैरों तले की जमीन खिसकी | लेकिन ... बस इतना ही कह पाई | सिंदूर से
भरी माँग के नीचे अट्ठनी वाली साइज की बिंदी को ठीक करते हुए बोलीं छोड़ो जी न जाने
कितने घरों में ‘काम’ फिर भोंडी सी मुस्कराहट | रश्मि को किरण के बारे में ऊलजलूल बातें सुनना पसंद नहीं
था | रश्मि ने कहा बुरा न मानना पर मुझे बाजार जाना है | हाँ-हाँ मुझे भी कहाँ
फुर्सत है ? राम-राम आजकल की लडकियाँ..|
रश्मि ने धड़ाम से किवाड़ लगाया लडकियाँ ही क्यों ?
हर अपराध का ठीकरा लड़की के सिर |लड़का क्यों नहीं ? वह आँखें बंद कर सोचने लगी | क्या किरण ने ...|
नहीं यह नहीं हो सकता | उसे याद आई वो साँझ | जब किरण घबराई सी लिफ्ट के पास टकराई
थी, अरे किरण! हांफ क्यों रही हो ? क्या हुआ यह चोट कैसी ?
कुछ नहीं | भर्राई सी आव़ाज | कुछ नहीं मैडम | बस
समय अपनी रफ्तार से चलता रहा | किरण को काली
साँझ ने घेर लिया .... पिताजी के इलाज के लिए वह शहर में नौकरी करने आई थी | क्या
हम प्रतिष्ठित रईस नामधारी लोग किसी को सहारा दे सकते हैं नहीं किसी को कलंकित
करना वो भी बेदाग़ होकर वाह! इज्जतदार लोग बस इतना ही कह पाई वह | दूधवाले की आवाज़
से चौंकी ! आती हूँ भैया | मन भीगा सा कह रहा था वो मोमजामे में लिप्त शिशु मज़बूरी
तो ... फिर भी जीव क्या करे ?
उफ़! दोनों ओर अमानवीयता | बुदबुदाती हुई नहाने
चली गई | आँखों का पानी पानी संग मिल गया | छककर रोई वह | और कर भी क्या सकती थी ?
No comments:
Post a Comment