Saturday, April 11, 2020

दोष किसका ?


आज तो रविवार  है ...हाथ में चाय का प्याला लिए रश्मि  बड़े इत्मीनान से चाय पीने के मूड में थी क्योंकि दफ़्तर पहुँचने की जल्दी तो थी नहीं आज| अन्यथा रोजाना चाय पी थोड़ी जाती है बस गटकी जाती है | बालकनी में हरे-भरे पौधों के बीच चाय पीना बहुत सुख पहुँचाता है उसे | आज भी वह ऐसे ही जौली मूड में थी | उसने   अखबार उठाया था कि आँखें दुनियादारी की कारगुजारी को टटोलने लगी | ‘मोमजामे में लिपटा शिशु’ पढ़ते ही इस तरह उछली मानों बिच्छू ने डंक मारा हो
उसके होठ बुदबुदाए हे भगवान ! फिर वह  झल्ला उठी पालना ही नहीं तो आखिर क्यों किसी के अपराधों की सजा नन्हीं जान भुगते | यदि चूहों या कुत्तों ने उस शिशु को .. बस काँप गई वह ,बदन सिहर उठा उफ़! रश्मि घृणा और दर्द से तड़प उठी | दोनों हाथों से सर पकड़ लिया | चाय तो कसैली हो ही चुकी थी |  अतीत के पर्दों से कुछ धुंधलायी सी टीस उठी और वक्त की मुट्ठी से यादें रिसने लगीं |
गंगू ताई एक किशोरी को लेकर रश्मि के घर पहुँची थी | पान से रंगें होठ फैलाए “मेमसाहब यह किरण है|” गाऊं से काम करने के वास्ते यहाँ आई है | काम सोब आता है एकदम झकास काम करेगी |ये मेरी गारंटी है | उसने अपने भारी शरीर को सरकाया और बोली – आठ पढ़ी भी है | चित्रगुप्त की तरह सारा चिठा खोलने के बाद वहीँ बैठ गई | गंगू ताई  का भी जवाब नहीं फुरसत में होती है तो मुहल्ले की रिपोर्ट ऐसे पेश करती है कि टी.आर.पी. बढ़ाने वाले चैनलों को भी मात दे | एक कप चाय उदरस्त करने के बाद उसकी जबान धीमी गति के समाचारों  में बदल जाती फिर खुद को ढोती हुई ओझल हो गई | मेहनतनामा करार होने के बाद किरण ने काम शुरू कर दिया | किरण का आना एक सुखद एहसास था क्योंकि वह हर काम बड़े सलीके से तो करती ही थी | ईमानदार इतनी कि चाहे सोना रखा रहे उसकी बला से | धीरे-धीरे उसने सारे काम सीख लिए | समय की पाबंद इतनी कि घड़ी की सुई के साथ चले | किरण के कदम यौवन की दहलीज पर पड़े ही थे कि उसका रूप निखरने लगा | काले लम्बे केशों में  गजरा लगाना उसे बहुत प्रिय था | फूलवाले की आवाज पर उसके कान खड़े हो जाते |  उसकी इच्छा देखकर रश्मि ने कई बार उसे गजरा लेकर दिया था | तब उसके गुलाबी रंग पर हलकी की सी ललाई छा जाती और कृतज्ञता के उसके हाथ जल्दी-जल्दी चलने लगते | जाते वक्त यही कहती ‘आप बहुत अच्छी हैं’ | रश्मि प्रत्युत्तर में मुस्कुरा देती | रश्मि को तो उसकी आदत सी पड़ गई थी|
  गाँव से आए हुए किरण को दो वर्ष हो गए थे |अब तो वह थोड़ी थोड़ी अंग्रेजी  भी जान गई थी | उसकी मेहनत और अच्छे व्यवहार की खुशबू कालोनी में फ़ैल गई | इस तरह कई घरों में उसे काम मिल गया | माथे पर बिंदी और उसके नीचे  देवी का कुमकुम लगाना वह कभी नहीं भूलती | वक्त का पंछी उड़ता चला जा रहा था | धीरे धीरे किरण कमनीय काया  पीले भांडे में बदलने लगी | अब उसका गुनगुनाना मौन हो चला था | उल्लास ने मानो मौन ओढ़ लिया हो | हर जवाब में हूँ हाँ |  मुस्कराहट तो कहीं दूर ख़ुशी खोजने चली गई | काम की  व्यस्तताओं के कारण उसके परिवर्तित रूप पर संदेह तो हुआ पर ध्यान ही नहीं दिया| वैसे भी  शहरों में किसी के पर्सनल जीवन में झाँकने  को फूहड़ता का परिचायक माना जाता है आखिर वह नौकरानी ही तो है |
कई दिनों से किरण आई नहीं | रश्मि को यह अच्छा नहीं लगा | वह सोचने लगी - सारा काम पसरा पड़ा है और कल तो मेहमानों को भी आमंत्रित किया है और कुढ़ने लगी वह | ये लोग होते ही ऐसे हैं जरा सा काम ज्यादा क्या मिल गया बस काम चोरी शुरू | हाथी  के दांत खाने के और दिखाने के और | रश्मि  झुंझला उठी | उसका ध्यान फोन पर गया और झट से  फ्लेट नंबर २०९  में फोन लगाया | हैलो आंटी क्या रश्मि आई आपके यहाँ | जवाब आया नहीं भई मैं भी उस महारानी का ही इन्तजार कर रही हूँ | दो महीने का एडवांस भी दे दिया है | जी अच्छा | रश्मि किरण के न आने से दुखी जरुर थी पर वह उसकी बुराई नहीं सुन सकती थी | अब उसका माथा ठनका | आखिर क्या हुआ होगा | उसका सिर झन्ना उठा | टिनटिन की  दरवाजे पर दस्तक | रश्मि लपकी कि किरण ही आई होगी लेकिन पड़ोस से मिसेज वर्मा ने गृहप्रवेश किया, लो आसमान से गिरे खजूर में अटके | अब तो एक दो घंटा चुगली की वेदी पर होम हुआ ही मानिए|
रश्मि ने जबरदस्ती में हाथ जोड़ अभिवादन किया | वे  दांत दिखाते हुए सोफे पर पसर गईं| मैं चाय लाती हूँ आप बैठिए कहकर रश्मि रसोई की तरफ मुड़ी |  चाय का पतीला चढ़ाया | मन रह-रह कर किरण के बारे में सोच रहा था |  मिसेज वर्मा ने चाय का प्याला थामते हुए कहा जानती हैं, मोहल्ले में आपकी किरण का उजास ही उजास है | रश्मि का मुँह खुला रह गया किरण का  ? और नहीं तो क्या | उन्होंने जोर से चाय सुड़की | और धीमे से कहने लगी अरे वह तो पेट से है | रश्मि के पैरों तले की जमीन खिसकी | लेकिन ... बस इतना ही कह पाई | सिंदूर से भरी माँग के नीचे अट्ठनी वाली साइज की बिंदी को ठीक करते हुए बोलीं छोड़ो जी न जाने कितने घरों में ‘काम’ फिर भोंडी सी मुस्कराहट | रश्मि को  किरण के बारे में ऊलजलूल बातें सुनना पसंद नहीं था | रश्मि ने कहा बुरा न मानना पर मुझे बाजार जाना है | हाँ-हाँ मुझे भी कहाँ फुर्सत है ? राम-राम आजकल की लडकियाँ..|
रश्मि ने धड़ाम से किवाड़ लगाया लडकियाँ ही क्यों ? हर अपराध का ठीकरा लड़की के सिर |लड़का क्यों नहीं ?  वह आँखें बंद कर सोचने लगी | क्या किरण ने ...| नहीं यह नहीं हो सकता | उसे याद आई वो साँझ | जब किरण घबराई सी लिफ्ट के पास टकराई थी, अरे किरण! हांफ क्यों रही हो ? क्या हुआ यह चोट कैसी ?
कुछ नहीं | भर्राई सी आव़ाज | कुछ नहीं मैडम | बस समय अपनी रफ्तार से चलता रहा | किरण को  काली साँझ ने घेर लिया .... पिताजी के इलाज के लिए वह शहर में नौकरी करने आई थी | क्या हम प्रतिष्ठित रईस नामधारी लोग किसी को सहारा दे सकते हैं नहीं किसी को कलंकित करना वो भी बेदाग़ होकर वाह! इज्जतदार लोग बस इतना ही कह पाई वह | दूधवाले की आवाज़ से चौंकी ! आती हूँ भैया | मन भीगा सा कह रहा था वो मोमजामे में लिप्त शिशु मज़बूरी तो ... फिर भी जीव क्या करे ?  
उफ़! दोनों ओर अमानवीयता | बुदबुदाती हुई नहाने चली गई | आँखों का पानी पानी संग मिल गया | छककर रोई वह | और कर भी क्या सकती थी ?





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