Sunday, April 12, 2020

पाशो की बयानी औरत की कहानी : ‘डार से बिछुड़ी’ -- कृष्णा सोबती


            
                                    

“मैं उस सदी की  पैदावार हूँ जिसने बहुत दिया और बहुत कुछ छीन लिया यानी एक आज़ादी और एक विभाजन|”
लेखक को उगना होता है,भिड़ना होता है | हर मौसम और हर दौर से नजदीक और दूर के रिश्तों के साथ रिश्तों  के गुणा भाग के साथ , इतिहास के फैसलों और फासलों के साथ | मेरे आस-पास की आबोहवा ने मेरे रचना संसार और उसकी भाषा को तय किया |”
 यह बेबाक अभिव्यक्ति ज्ञानपीठ पुरूस्कार की हकदार कृष्णा सोबती की ही हो सकती है | जिसने युद्धों , विभाजनों  की विभीषिका में स्वयं को झोंका हो तथा उस त्रसाद जीवन को झेला हो | यही कारण है कि लेखिका की कलम से निकला हर किरदार  प्रत्यक्ष बोलता सा अनुभव होता है | लेखिका कृष्णा सोबती  विशेषकर दबी कुचली स्त्री की आवाज़ बनकर उभरती हैं | उनकी रचनाओं में नारी संघर्ष करती दिखाई देती है | उनका हथियार उनकी कलम रही है | वे कहती हैं  ---
‘जिंदगीनामा’, ‘दिलोदानिश’, ‘मित्रो मरजानी’ ‘समय सरगम’, ‘यारों के यार’ में सभी कृतियों के रंग अलग हैं | कहीं दोहराव नहीं सोचती हूँ क्या  मैंने लड़ाई लड़ी ? तो पाती हूँ लड़ी भी और नहीं भी | लड़ाई तो मैंने बिना लड़े ही जीत ली | कोई आन्दोलन नहीं चलाया लेकिन संघर्षों की, सम्बन्धों की,खामोश भावनाओं की राख में दबी चिंगारियों को उभारा उन्हें हवा दी, जुबाँ दी |” -- कृष्णा सोबती
कृष्णा सोबती के उपन्यास  ‘डार से बिछुड़ी’ के सन्दर्भ में बात की जाए तो यह स्पष्ट होता है कि यह एक मनोवैज्ञानिक धरातल पर रचा बुना गया उपन्यास है | एक किशोरावस्था  वैसे ही तनाव और तूफ़ान का काल होता है | ऐसी स्थिति में शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों के चलते पाशो (पात्र) आकर्षण – विकर्षण, सही और गलत के असमंजस में रहती हैं |
 पाशो ने किशोरावस्था की देहरी पर पाँव रखा ही था कि उसकी इच्छाएँ पील भरने लगी, वह छलांग लगाने को तत्पर कि बिछुड़ी माँ से मिल आऊं, उसकी झलक पालूं .... बस यही तो था वह झोंका जिसने उसे अपनी डार से बिछुड़वा दिया ...... “ शाह आलमी से जब तिल्लेवाली नोकदार जूती पहने,  फुम्मनियोंवाला लम्बा पराँदा डुलाते निकलती तो आवाजे सुन-सुन मुस्काती ! “माँ क्या मुझसे कम रही होगी खोजों के घर जा पटरानी बन बैठी |” चाहती किसी दिन चुपके से खोजों की हवेली जाऊं और किसी  झरोखे से अपनी माँ कहलानेवाली की एक झलक तो पाऊं |” (पृष्ठ .संख्या 16)लेखिका  समाज की बंधक रूढ़िवादिता का प्रतिरोध करती हैं यह उनके साहित्य की मौलिक विशेषता भी है “ विधवा होकर भी पाशो की माँ शेखों के घर बैठ गई यह एक चुनौती ही तो थी जिसने स्त्री के बंधक नियमों को ठेंगा दिखा दिया | यहाँ पारंपरिक विधवा का नारकीय जीवन छोड़ अपने बारे में सोचना ही नई सोच को रेखांकित करता है |
 पाशो का जीवन सुर-सरगम से दूर था वह तो अपनी माँ से मिलने को छटपटाती और यही कारण था कि वह शेखों की हवेलियों की ओर चल पड़ी बस यही इच्छा उसके गले की फांस बन गई , वह अपराधी हो गई | अब तो उसका चलना , उठना बैठना सब अपराध के घेरे में आता |
पाशों हमेशा किसी न किसी के हत्थे चढ़ी रहती | डांट-फटकार , मारपीट, तीखे व्यंग बाणों से उसका कलेजा छलनी हुआ रहता | यहाँ यह बात झूठी ही सही किंतु सच लगती है कि ‘औरत ही औरत की दुश्मन होती है|’  नानी – मामी की खूंखार नजरें पाशो को हमेशा बेंधती रहती,  जरा सा खुश होले तो मामी के बोल  तीर बन उसके कलेजे को चीर देते  “रब तुझे सम्भाले, अरी कपड़ा नीचे रखा कर !” नानी कहती – “अरी मरन जोगी, कल आती मौत तुझे आज आए! “(23 )
पाशो अनेक  पुरुषों के शोषण का शिकार होती है | “मामू ने भंभीरी – सी मेरी चुटिया घुमाकर पसार की दहलीज पर दे मारा  ... मामू ने हिकारत से कहा “ तंदूर लगाने को क्या यही चुड़ैल रह गई है? इसे बर्तन – भांडे दिया करो मलने को ..” (16) इसके जरिए लेखिका ने पुरुषवादी समाज की संकीर्ण,विद्रूप सोच का  न केवल पर्दाफाश किया है बल्कि उनके  भौंडे और कुंठित भावों का खुलासा  किया है  |

पाशो दोहरे मनोभाओं से घिरी थी जो उसे अलग – अलग दिशाओं में ले उड़ते थे कभी मन को पांख लग जाती तो वह सुनहरे सपने बुनने लगती, लेकिन उसे न तो सपने देखने का हक़ था और न ही वह उड़ान भर सकती थी | उसके पंख उगने से पहले ही काट दिए जाते ...  “आग लगे तेरी जवानी को ! राम्बयाँ, खोल इसका फुग्नियों वाला पराँदा ....|
कृष्णा सोबती ने स्त्री के अंतर्मन को संवेदनशील आंखों से पढ़ा है | ‘डार से बिछुड़ी’ की पाशो परम्परा में जकड़ी हुई नारी है | लेखिका ने लताड़, फटकार दासत्व, दमन और उत्पीड़न से मुक्ति की आकांक्षा को बल दिया है | लेखिका स्त्री की आज़ादी और न्याय की पक्षधर है उनकी यह इच्छा पाशो में चरितार्थ होती है पाशो का विद्रोही मन कह उठता है ---   
“मन में आया राम्बयाँ समेत तीनों को रौंदती हुई घर से बाहर हो जाऊं |” यह सोच स्त्री को सम्बल देती है | कृष्णा सोबती की रचनाओं में वैक्तिक,पारिवारिक एवं सामाजिक विषमताओं का प्रखर विरोध मिलता है |विधवा होकर भी  पाशो की माँ पारंपरिक बन्धनों के बावजूद शेखों की हवेली जा चढ़ी | विधवा के  नरकतुल्य जीवन  को ठुकराकर अपना जीवन सुधारना या अपनी इच्छा से जीना एक नई सोच को स्पष्ट करता है | भले ही यह कदम उसके तथा उसकी बेटी के लिए सज़ा का फरमान बन गया हो |
स्त्री खुलकर जी नहीं पाती क्योंकि  समाज ने उसके हाथ बाँध रखे हैं वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पाती है यदि करने की हिम्मत करे भी तो पाशो बन जाती है जो हर बार छली बेचीं और पीटी जाती है| “पाशो की माँ विधर्मियों के घर जा बैठी तो बेटी का क्या ? इसे इसे तो जहर दे देना चाहिए या फिर दरिया में डुबो देना चाहिए |” इससे स्पष्ट होता है कि स्त्री कुछ करे न करे वह जन्म से ही दंड सहने के लिए अभिशप्त है “नानी माथे पर हाथ रख कर बोली – “किन पापों का फल मिला मुझे इस जन्म में मिलना था | बहू, इसे मोहरा दो मोहरा, ऐसी सोए कि जागे ना |”  यह भय ही पाशो को खींच ले गया शेखों  की हवेली की ओर जहाँ वह माँ के आँचल में जा छुपी |किंतु कितनी देर ...|
स्त्री को अनेक त्रासदियों को  जीना और उसे  झेलना पड़ता है यह ‘डार से बिछुड़ी’  में बखूबी देखा जा सकता है | मौत के मंडराते सायों में वह  जिंदगी का फलसफा खोजने  चल पड़ी थी |  नानी की दहलीज पार की कि वह अपनी माँ के आँचल में छुप जाएगी, जिसके अभाव में वह रात-दिन लहूलुहान थी | ‘डार से बिछुड़ी’ में स्त्री कथा व्यथा का मार्मिक चित्रण हुआ है नि: संदेह कृष्णा सोबती स्त्री  अंतर्मन को अभिवक्त करने वाली सम्वेदनशील तथा मंझी कथाकार हैं | स्त्री की अनेक रूपों में होती दुर्दशा का चित्रण उन्होंने ‘डार से बिछुड़ी’ में किया है | इस उपन्यास में एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो अपनी जड़  से कटने के बाद खरीदी, बेची, और भगाई जाती है |केवल वस्तु बनकर जिसे दूसरों को रीझाना है , खुश करना है | मौसी ने कहा  “ पली-पलाई है री मालन , मेरे बेटे को खुश करना सीख|” जैसे वह केवल मन बहलाव की गुड़िया हो | न कोई उसकी अपनी इच्छा और न कोई अपनी पसंद |फिर भी पाशो अपने भाग्य का लिखा मान सब सहने की आदत डालती है |  ‘ड्योढ़ी की दहलीज पर हाथ पकड़कर अर्ज की – “ मुझे कहाँ लिए जाते हो ? इस अभागी को अब घर से न निकालो|” (92)पाशो का जीवन अंधकार में डूबा था | कभी कहीं से प्रकाश का एक छिटका आ भी जाता तो वह अधिक समय तक टिक नहीं पाता, फिर से वह उसी दम घोटू जीवन में साँस लेने को विवश हो जाती  है |  पिता की उम्र वाले दीवान जी के घर चढ़ा दी गई पाशो | ना राग न रंग बस सौदा पटा दिया गया |इसे  अपना  भाग समझकर सब स्वीकार किया |  लेकिन दीवान जी मृत्यु के बाद फिर से वही अँधेरा एक सहारा अनमेल ही सही पर था तो सही वह भी चला गया |अब क्या करे पाशो ?  बस   कर्जे के बदले बेच दी गई | “द्रोपदा, खैर मन इस अच्छे घर पहुँच गई, नहीं तो बरकत कसाई एक बार नहीं सौ बार तुम्हें बेच खाता |”
पुरुषसतात्मक समाज में नारी एक वस्तु या दात से बढ़कर नहीं दासत्व और दमन झेलने को विवश है |  “भागभरी, खरी बात कहता हूँ| सीधी राह चलेगी तो वाह भला! तीन-तीन पहरू हूँ, भूलकर भी ड्योढ़ी से बाहर पाँव न रखना ! समझ रख बीबी, घड़ा - भर मोहरें दी हैं,तू अब इस घर की दात |”
डार से बिछुड़ी पाशो के उत्पीड़न और शोषण की व्यथा है| “ नखरे रख आ एक ओर और पानी लाकर पैर धो |” (83)
क्रय- विक्रय की सोदेबाजी से बेखबर पाशों हमेशा यही पूछती रही कि “मैं कहाँ हूँ ... मैं कहाँ हूँ |” उसका कोई ठौर नहीं, ना ही कोई ठिकाना | उसे नानी की बात हमेशा याद आती कि –“ संभलकर री, एक बार का थिरका पाँव जिंदगानी धूल में मिला देगा |”(123)
अंतत: यही कहा जा सकता है कि ‘डार से बिछुड़ी’ कृष्णा सोबती की ऐसी रचना है जिसमें स्त्री के कोमल और करुण मनोभाओं का मर्मस्पर्शी लेखा है | नारी मन की सूक्ष्म पड़ताल करने वाली, उसे मथने वाली श्रेष्ठ रचना है या यों कहें कि स्त्री मन की साक्षी है |

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