..
ईश्वर करुण प्रतिभा के धनी हैं औरवे अपनी कविताओं
से अंत:करण की वेदना को जानने और समझने की अनुभूति प्रदान करते हैं |
उनके गीत रेत के बिछौने पर की सरसराहट से मन की गहराइयों को टटोलते ही नहीं बल्कि गहनता की अनुभूति कराते हैं |
मानवीय सम्वेदनाओं को तपिश देकर पिघलाने वाले
रचनाकार हैं ईश्वर करुण | ‘चुप नहीं है ईश्वर’ काव्य संग्रह के अंतर्गत गीतों की
जो गूंज है वह सच में चुप नहीं है| गीत कहीं आत्मा को झकझोरते हैं, तो कहीं गीतों की स्वच्छता
और पवित्रता को स्फूर्तिदायक बनाते है|
उनकी कलम केवल कल्पना के पंखों की उड़ान भर नहीं होती बल्कि जीवन में घटती -
बढ़ती स्थितियों को कुरेदते हुए यथार्थ के धरातल पर खींचे गए वास्तविक क्षणों का
आभास कराती हैं | ‘चुप नहीं है ईश्वर’ काव्य संग्रह से अट्ठावन कविताएँ छलकती
हैं | सबका अपना अलग रूप सबकी अपनी अलग
खुशबू है |
ईश्वर करुण को शब्दबद्ध करनामेरे जैसे नौसिखिए के लिए दुर्लभ
है क्योंकि इनके गीत अनुभूतियों की गहराइयों में गोते लगाते हैं|
‘तमिल’ या ‘तमिलनाडु’ को हिंदी विरोधी माना जाता
है किंतु ईश्वर करुण ‘तमिल बंधु’ कविता में उनके सौहादर्य का परिचय
देकर नकेवल तमिल लोगों के प्रति गलत धारणा
को बदला है बल्कि बन्धुत्व की भावना का विकास भी किया | इस कविता में जो आत्मीय
भाव हैं वे राजनीति के बनाए फंडे कि ‘तमिल हिंदी का मेल नहीं’, के चेहरे पर का
नकाब उतार फेंकता है | करुण जी की यह
कविता दोस्ती का दस्तावेज़ है | ..
‘तमिलबंधु !
मैं आया था
तुम्हें हिंदी पढ़ाने
यह दर लिए कि
शायद तुम मेरा चेहरा
कालिख से पोत
दोगे .... (49)
किंतु यह कविता उस छद्म भ्रम को तोड़ती है और
कृतज्ञता की भावना से सराबोर है जो मानवता की सूचक है और इंसानियत का पैगाम देती
है ...
“किंतु तुमने मुझे अपने हाथों पर उठा लिया
मुझे सर छुपाने की छत दी
हिंदी पढ़ाने के साथ मैंने तुम्हें पढ़ा
और पढ़ी तमिल भाषा और संस्कृति |
इसी पढ़ने पढ़ाने में हम एक दूसरे के ‘सहोदर’ बन गए
|” (49)
कवि का मन रह-रह कर याद करता है भूले बिसरे गाँव
की मेड को जहाँ से वह देखता था कुदरत का चुलबुलापन , बरगद की छाँव, चिड़ियों की चहचहाहट...
इस चाह को यात्रा कविता में देखा जा सकता है इसे पाने वह चल पड़ता है एक यात्रा पर
जो केवल उसे अपने गाँव की डगर पर ही मिल सकती है क्योंकि महानगरों की गगनचुंबी
इमारतों में कुदरत का दीदार नहीं होता |
“मुझे
शाम देखने के लिए भी
यात्रा करनी पड़ती है...!
चिड़ियों
का कलरव तो कई यात्राओं मेंभी
सुनने का सौभाग्य नहीं मिला...
तब यात्रा करनी पड़ी अपने भूले-बिसरे गाँव के बरगद
तक की ... |”(48)
‘बगुले
ने गाँव छोड़ा’ में पर्यावरण की चिंता व्यक्त होती है | आशियाने
के फेर में उड़ गए कुछ भूले भटके आते हैं तो कुछ हमेशा के लिए दूर चले गए हैं |
“ गौरैया ने गाँव छोड़ दिया
शहर में भी दिखाई नहीं पड़ी
जाने कहाँ चली गई |”(50)
पक्षी विशेष कर ‘गौरैये’ घर आँगन की शोभा हुआ करती
थीं | सहृदयी कवि की करुण पुकार में उनके लुप्त हो जाने की पीड़ा स्पष्ट दिखाई देती है |
आजकल के बच्चों के लिए चिड़ियों प्रत्यक्ष दर्शन
दुर्लभ हो गया है | वे कार्टून या फिर एनिमेशन से काम चलाते हैं ऐसी स्थिति में ..
“ कल का बगुला भगत ही
अब गाँव का प्रतिनिधि रह गया है
बच्चे ‘चिड़िया’ का पाठ उसी से पढ़ने लगे हैं|
‘बगुला’ गाँव का प्रतिनिधित्व करता है | उसके कन्धों
पर झूल रही है जिम्मेदारी | ग्लोबल वार्मिंग के कारण पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है |
इसका प्रभाव न केवल मनुष्यों पर बल्कि पशु -पक्षियों पर रहा है या फिर यों कहें कि
इसकी मार सारी प्रकृति झेल रही है | चिर-
परिंदों ने अपने आशियाने छोड़ दिए हैं या
फिर लुप्त होने के कगार पर है | इसी की कसक है कवि को |
बारिश जीवनदायनी है| वर्षा की हर फुहार में जीवन
की ताज़गी, उल्लास है| यह भाव करुण जी की ‘उदगमंडलम’/ ‘नीलगिरी की बारिश’ का
है | सच में गगनचुंबी इमारतों से दूर महानगरों की पहुँच से बाहर बैठा किसान ही बारिश
का आनंद उठा पाता है | इस कविता में बारिश
के प्रति दो दृष्टिकोण हैं एक तो चिड़ई,बच्चे,जंगल, किसान सभी की ख़ुशी ठिकाना नहीं
है क्योंकि चिड़िया को कीड़े मकोड़े खाने को
मिल जाएँगे| बच्चों को कागज़ की नाव चलाने का मौका मिल जाएगा और तो और ईरुला के चाय
की अच्छी फ़सल से उसकी बिटिया पढ़ लेगी | अर्थात बारिश खुशियों की सौगात ले आई है |
“ झड़ी
लगी है|...
चिड़ई खुश हैं,
मिलेंगे ढेरों कीड़े और मकोड़े !
बच्चे खुश हैं,
मिलेगा मौका, भीग-भीग
कागज़ की नाव चलाने का !” (51)
दूसरा कुछ लोग बारिश से नाराज़ हैं वे वर्षा को
पसंद नहीं करते | किंतु वर्षा तो जीवन का आधार है अत: झमाझम बरस रही है , हँस रही
है | वर्षा का मर्म भारतीय कृषक ही जान सकते हैं इसलिए प्रसन्न हैं |
‘कम्प्यूटर और कविता’ इस कविता में
आज की पीढ़ी को कवि का सम्बोधन है | आज बच्चा
“सिलिकैन वैली”, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर,चिप्स ... सब जानता है, पर वैली ‘घाटी’ और
घाटी की वास्तविकता ,उसकी नैसर्गिकता से वह वंचित है | हमने आज कृत्रिमता ओढ़ - पहन ली है, जिसके चलते प्रकृति
के सुखद अहसास से बहुत दूर होते चले गए हैं | कवि चाहता है कि आज की जनरेशन अपनी
जड़ों को पहचाने |
“मेरे बच्चो!
“घाटी” क्या होती है...
क्या होता है नदी का स्वभाव |
क्या तुम्हें मालूम ही – आलू की क्यारियाँ?” (54)
कुदरती जीवन की सहजता से दूर आभासी संसार में जी
रहे हैं हम | इस बात को कवि ने बहुत सुंदर ढंग से कहा है ...
क्या
तुमने चिड़िया के घोंसले के अंडे को
पेड़ की
डालियों पर चढ़कर देखा है? (54)
यह कविता पढ़ते हुए मेरे जीवन (ग्राम) की वे
धुंधलाई स्मृतियाँ साफ़ होने लगी जो महानगरों के धूल – धक्कड़ के कारण मानस पटल से
ओझल हो गई थीं | कवि का अनुभव प्रकृति की गोद में पला बढ़ा है | इसलिए इतनी
चित्रात्मकता है |
“ क्या कभी होड़ किया है नवजात मेमने के साथ
जो अपने ऊपर से टोकड़ी के हटते ही
छलांगे मारने लगता है?
“बेल के काँटे से काँटे निकालने की खुबसूरत कला??? (55)
अहा ! यह है जीवन और उसकी रचनात्मकता ..|
आज की
युवा पीढ़ी को सुन्दर संदेश दिया है और मौलिक सृजन का महत्व बताया है |
“कम्प्यूटर
हमारे ज्ञान को बाँटता है,किंतु –
ज्ञान की मौलिक सर्जना के लिए
तुम्हें आना ही पड़ेगा कविता के पास | (55)
यह प्रोत्साहन है | कल्पना और वास्तविकता की
पहचान बताती है यह कविता | ‘चुप नहीं है ईश्वर’ कृति में पक्षियों का कलरव है तो
कम्प्यूटर की खटपट भी, ‘सिल्क सिम्ता की सिसकी भी है तो भूख़ के मौन को तोड़ने वाली
भाषा भी है | माँ की यादों के झरोखों से कवि मटरगस्ती करता हुआ तमिलनाडु और उसके
विविध मिथकों को तोड़ता हुआ दिखाई पड़ता है|
‘भूख की भाषा’ भाषा -बोली पर विवाद भरपेट खाने वाले ही
करते हैं| आपसी व्यवहार में कोई भी भाषा बाधक नहीं बनती | रोजी - रोटी और भूख को भाषा
के साँचों में नहीं डाला जा सकता | वह तो बर्फ में छुपे पानी की तरह है जो जरुरत
के आधार पर पिघलता दीखता है |
“ ऑटोवाला मुझे मद्रासी समझकर हिंदी में
रिझाने की ईमानदार कोशिश करते हुए
अपने ऑटो पर बिठाने को रिरियाता मिला !
ये सभी तो एक ही भाषा बोलते हैं/ अपनी अपनी आँखों
से |
भूख की अपनी भाषा होती है!
राजनीति की भाषा
महलों में सोती है
भूख की भाषा तो झोपड़ी में रोती है !
राजनीति और भूख की भाषा कब होती एक ? (75)
अंतत: यही कहा जा सकता है कि सच में ‘चुप नहीं है
ईश्वर’ धरती के कण-कण में ईश्वर का स्पंदन है| बस सुनने की आवश्यकता है | ईश्वर साक्षात
प्रकृति के हर रूप रंग में दिखाई देता है |
“वह बोलता है
खोलता भी है हृदय के रहस्य
हमारे समक्ष !
चुप नहीं है ईश्वर !
किंतु हम हैं कि सुनते ही नहीं
धुनते रहते हैं सिर-
‘ईश्वर चुप है! ईश्वर चुप है !! (86)
इस कविता (ईश्वर चुप नहीं है) में क्रिया का
सुंदर चित्रण हुआ है |
वह डोलता है पवन में
हँसता है फूलों में
गरजता हही बादलों में लरजता है
आँचल में ........
कभी चिड़िया बनकर चहकता है
कभी चिंघाड़ता ही हाथी बनकर
या फिर बाघ सिंघ के रूप में दहाड़ता है |
कवि उजड़ती प्रकृति को लेकर चिंतित है साथ ही वे
आज की जीवन शैली जो पूरी कृत्रिम हो चुकी है पर व्यंग्य भी करते हैं ..
लेकिन हम हो गए हैं चिड़िया से दूर
और हाथी हम से दूर हो गए
बाघ-सिंघ से तो हम
साल-दस साल में मिल लेते हैं टी .वी.पर ! (87)
ईश्वर करुण की कविताएँ आभासी दुनिया की चुप्पी तोड़ती हैं तो वह
पक्षियों के कलरव, कलियों के चटखने और बच्चों की किलकारी में टूटती हैं , फूटती भी
हैं |
कवि की हर
कविता ह्रदय में रचती बस्ती है| कहा जा सकता है कि ये सम्वेदनाओं से भरी कविताएँ
है |
No comments:
Post a Comment