के अभाव के कारण आज आए दिन प्रतिदिन पवित्र रिश्ते स्वार्थ तथा कामंधता की वेदी पर चढ़ते
हुए दिखाई देते हैं |
वर्तमान शिक्षा में विज्ञान के विकास
पर जोर दिया जाता है किन्तु संस्कारी शिक्षा कल्याणकारी जीवन मूल्यों में भारी
गिरावट आ रही है प्राचीन मूल्यों के प्रति आस्था हिल गई है अत:
व्यक्ति बुद्धि तर्क एवं भौतिक सुखों को ही जीवन का सार मान रहा है | और इसे पाने के लिए वह कर्तव्यबोध से मुंह मोड़ रहा हा परिणामस्वरूप प्रकृति का दोहन, अराजकता,अशांति, आपदाओं को न्योता दे रहा है |
मूल्याधारित शिक्षा न केवल व्यक्ति के
जीवन को सुधारती है बल्कि राष्ट्र या यों
कहें कि विश्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती ही |
समाज में जीवनोपयोगी मूल्य अत्यंत
जरुरी है अन्यथा पाशविक प्रवृति का बोलबाला होगा ऐसी स्थिति में
सुखमयी जीवन की कल्पना भी निराधार साबित होगी |
मूल्यपरक शिक्षा सिर्फ ‘पाने’ की अंधी
दौड़ से परे ली जाती है जीवन जीने का सलिका सिखाती है | स्व से ऊपर पर के कल्याण की भावना को जन्म देती है |
विज्ञान की प्रगति आवश्यक है पर उसकी
सही उपयोगिता साहित्य ही सिखा सकता है |
विज्ञान का अपना महत्व है | विज्ञान ने
जीवन को सुविधाओं से लबालब कर दिया किंतु इसके सही उपयोग के अभाव में मनुष्य आलसी
बनता जा रहा है | अच्छे और बुरे के बीच का
अंतर जीवन मूल्य से ही सम्भव है | अन्यथा विज्ञान का अँधा उपयोग मनुष्य को विनाश
के कगार पर खड़ा कर देता है |
|
सबसे बड़ी बात मूल्यपरक शिक्षा से ही
मनुष्य में संवेदना का अंकुर फूटता है | संवेदनहीनव्यक्ति तो
वो रोबोट है जो खाना तो परोस देगा पर भूख
जगाने का सामर्थ्य उसमें नहीं है |
वर्तमान वैश्विक परस्थितियों में समाज एक बड़े परिवर्तन
से गुजर रहा है। जहाँ पैसा बाजार की माँग बढ़ रही है | तथा नैतिकता में आ रही है
यही कारण है कि
मूल्यपरक शिक्षा के अभाव में आज
आए दिन पवित्र रिश्ते स्वार्थ तथा कामंधता
की वेदी पर दम तोड़ते नजर आते हैं |
शिक्षा भी धर्म की आड़ में आ गई | आज
किसी भी पाठ्य पुस्तकों में रामायण, बाईबल कबीर को स्थान बहुत कम मिलता है जबकि
इनमें वर्णित शिक्षा मूल्याधारित होती है |
आजकल धर्म का अर्थ बदल गया है “ धर्म
का अर्थ अच्छाई और सच्चाई” से कोसों दूर रामायण में वर्णित जीवन मूल्यों को
आत्मसात करके मनुष्य सफलता प्राप्त कर सकता है |
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