Saturday, April 11, 2020

60 की हुई कादम्बिनी ....


| छ: दशकों से पाठकों के मन पर राज करना, पाठकों में पढ़ने की तलब जगाए रखना, पाठकों को प्रेरित करना अपने आप में सराहनीय कार्य है | नवंबर २०१९ का अंक ‘यादों की बारात’ बन अनगिनत सुख-दुःख को बयां करता हुआ आया |
सच में यादों के सहारे ‘यादों’ में ही तो जीता है मनुष्य | स्मृति  ईश्वर प्रदत्त वह वरदान है जिसके सहारे मनुष्य जिंदगी की डगर पर चलता है | ये यादें कभी गुदगुदाती हैं तो कभी रुलाती हैं अर्थात  सुख-दुःख को प्रतिबिंबित करती हैं | ‘यह सिलसिला कभी रुकता नहीं’ में  प्रो.अब्दुल बिस्मिल्ल्हा ने  यादों के झरोखों  से अपनी खट्टी-मीठी बातें साझा की |  हर एक ताने के साथ जीवन के कटु सत्य और संघर्ष का बाना बुनती सी नजर आती हैं इनकी यादें | ‘मौलाना आजाद विश्वविद्यालय’ (हैदराबाद ) में अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के दौरान मुझे बिस्मिल्ल्हा जी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है | सच में जो बात जहन में उतर जाए, दिल के दरवाजे से बाहर निकलती ही नहीं हो  वही बातें ‘यादों’ का दस्तावेज बनती हैं | आए दिन अनगिनत पहलूओं पर चर्चा चलती रहती पर कुछ ऐसा घटित होता है जो सीधा दिल पर दस्तक देता है वही स्मृति के सायों में झूलता है | मुजफ्फर अली की यह बात कि फिल्म तो ‘नौस्तेल्जिया’ है बहुत अच्छा लगा| आज भी अन्ताक्षरी के समय वही पुराने गाने जुबां पर आ जाते हैं क्योंकि वे यादों में हैं अर्थात उनका प्रभाव पर आज भी राज करता है|  बच्चन जी की कविता क्या ‘भूलूं क्या याद करूँ’  संदर्भानुसार बहुत महत्व रखती है |
‘अटपटी यादें’ में ममता कालिया ने बचपन की बातों से रूबरू कराया कि बचपन मस्ती के लिए होता है | ‘इंटरनेट के दौर में यादें’ इवान मॉरिसन  स्मरण शक्ति के क्षीण होने के कारणों का उल्लेख किया है, विचारणीय है | आज छोटे छोटे जोड़ घटाव के लिए हम कैलकुलेटर पर आश्रित होने लगे हैं, पहले फोन नंबर जुबाँ पर होते थे| इसमें संदेह नहीं कि आज मोबाइल ने हमारी स्मृति पर अंकुश लगाया है| सारे लेख ज्ञानवर्धक हैं |
कादम्बिनी का जवाब नहीं दिसम्बर का अंक शब्दों की दुनिया में वर्ष का लेखा जोखा शब्द कभी अतीत की परतें खोल रहे हैं |  ‘गल्प या पल्प’, ‘एक ज़िद है नई वाली हिंदी की’ और ‘खुल रही हैं अलग-अलग राहें’ हिंदी जगत के लिए प्रसन्नता का सूचक है | ’हाशिये पर नहीं रहे हाशिये के लोग में चित्रा मुद्गल जी ने पिछड़े तथा उपेक्षित लोगों पर लिखे साहित्य पर ख़ुशी जाहिर की है तो चिंता भी प्रकट की है  कि बहुत सी साहित्यिक विधाओं पर संकट मंडरा रहा है | साथ ही प्रकाशकों की पसंदीदा रचनाओं की जानकारी बहुत अच्छी लगी इससे पाठक रचना पढ़ने को प्रेरित होता है |
अंतत: संपादक महोदय तथा सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएँ | आने वाला वर्ष नव मंगलमय हो | इसी आशा के साथ .....|
डॉ. मंजु शर्मा
हैदराबाद |

No comments:

Post a Comment

 <a href="https://www.teacheron.com/tutor-profile/8YoD?r=8YoD" target="_blank" style="display: inline-block;...