Saturday, April 11, 2020

रवीन्द्र कालिया की यादों में श्री लाल शुक्ल ...


                                 


इक्क्यावन वर्ष  लाँघ रहा है रागदरबारी | आज भी चारों ओर धूम मचाए हुए है|  रागदरबारी एक बिगुल है जो जागते हुओं को जगाता रहा है | यह सच है कि  बागान की बहार और उसकी महक मन  को प्रफुल्लित करती है किन्तु उस नैसर्गिक सौन्दर्य का भान कराती हरियाली के नीचे जहरीले कीट -पतंग भी रहते हैं| भोले-भाले गाँव, देहात की जमीन तले कुछ ऐसे कांटे भी होते हैं जो नैतिकता को लहूलुहान कर देते हैं |  कुछ ऐसा ही बयां करती है श्री लाल जी की कलम जब रागदरबारी पर चलती है | गाँव देहात का नाम सुनते ही माटी की सुगंध मन को तृप्त करती है पनघट पर चलने वाली घारी जीवन के संघर्ष का तान छेड़ती है फिर भी कुछ तो  झीना सा पर्दा है सच्चाई का ऐसा भी है, जो श्रीलाल शुक्ल हटाते हैं |
जीवन की वास्तविकता से रूबरू करने वाले गद्य शिल्पी हैं श्री लाल शुक्ल |
आज भी देश का हर नागरिक रंगनाथ जो (‘रागदरबारी’ का प्रत्यक्ष दृष्टा है)  जैसी अनुभूति रखता है| आज शिवपाल गंज  बने देश में जनता रंगनाथ बनी ही तो घूम  रही है | जहाँ व्यवस्था के प्रति आक्रोश तो कहीं षड्यंत्र है पर प्रतिकार करने या सुलह करने  की हिम्मत नहीं है | ‘रागदरबारी’ में जहाँ कुव्यवस्था को तार-तार किया गया है वहाँ हम देखते हैं कि स्वच्छता ‘शौचालय’ की आवश्यकता पर भी बात उठाई है गई है |  सड़क किनारे  बैठी शौच के लिए खड़ी हुई औरतों का कष्ट अभी तक कमोबेशी सालता ही है | रागदरबारी उनके सीने पर लगा तमगा है जिसकी झिलमिलाहट आज भी बरक़रार है |
 उनकी पैनी नजर ने  व्यवस्था में लगे घुन को पहचाना है | सिस्टम में रहकर सिस्टम तोड़ने तथा व्यवस्था में पुलिस,न्यायालय,स्कूली त्रिकोण के बीच अनैतिकता के दलदल पर  बात कोई साहसी व्यक्ति ही कर सकता है | अन्यथा सामान्य तौर पर तो यही होता है कि पानी में रहकर मगर से बैर कैसे संभव है ?  झूठ फरेब और मक्कारी से लिप्त समाज को बेपर्दा करने वाली रचना है ‘रागदरबारी|
श्री लाल शुक्ल जी का ध्यान आते ही रागदरबारी के पन्ने स्वत: ही खुलने लगते हैं अत: बिना रागदरबारी के बात आगे बढ़ती ही नहीं अर्थात श्री लाल शुक्ल बनाम  ‘रागदरबारी’ | बेस्टसेलर की बात पर श्री लाल शुक्ल जी स्वयं झुंझला उठे थे,  बोले, ‘बेस्टसेलर नहीं मेरे गले में पत्थर बन कर लटका है। कोई रागदरबारी से आगे की बात ही नहीं करता !’ यही इसकी लोकप्रियता का प्रमाण है | आज विद्वतजन इस पर अपने विचारों से हमें लाभान्वित करेंगे ही |
मैं कुछ और कहना चाहूंगी .....
श्री लाल शुक्ल जी  सहज स्वभावी,सतर्क, विनोदी लेकिन विवेकी विद्वान थे | शुक्ल जी ने व्यवस्था की जड़ों तक जाकर व्यापक रूप में समाज की छानबीन कर उसकी नब्ज को पकड़ा है | श्री लाल शुक्ल एक जिंदादिल इनसान थे उनका कहना था बोझिल जीवन का जिम्मेदार स्वयं मनुष्य है वह  खुल कर हँस भी नहीं सकता, हँसने के लिए भी उसे लाफिंग क्लब का सहारा लेना पड़ता है| शुद्ध हवा के लिए उसे आक्सीजन पार्लर जाना पड़ता है |



अब एक नजर डालते हैं रवीन्द्र कालिया की यादों में श्री लाल शुक्ल ....
रवीन्द्र कालिया जी का कहना है कि श्री लाल शुक्ल  एक खरे मनुष्य  के रूप में आते हैं जो क्रोध करता है, डांटता है पर स्नेह में सराबोर भी रहता है | प्रखर विचारों के धनी  होने के कारण वे हर बात में सिर नहीं हिलाते थे | बाकायदा  खीज उठते, फटकार लगा देते किंतु यह नोक झोंक कभी सम्बंधों में आड़े नहीं आई | यही आत्मीय व्यवहार उन्हें औरों से अलग करता था |
सामान्यतया अतिथि का स्वागत चाय -पानी के साथ होता है किन्तु यहाँ तो बात ही निराली होती कि श्री लाल शुक्ल जी मदिरा से स्वागत करते | रवीन्द्र जी ने लिखा है ... :मैं हिंदी के खुशनसीब लेखकों में से हूँ जिसने श्री लाल जी के साथ जमकर दारू पी  है और उससे कहीं ज्यादा स्नेह पाया है |”  कई ऐसी घटनाएँ है जिससे स्पष्ट होता है कि मदिरा प्रेम के लिए वे काफी मशहूर थे | यथा एक बार चौकीदार से पूछने पर कि साहब क्या कर रहे  हैं ? जवाब मिला ---शराब पी रहे हैं | एक बार पचत्तर वर्ष के होने पर समारोह मनाया गया इस पर वे कहने लगे अब प्रतिष्ठित मौत मिलेगी | पहले मर जाता तो लोग कहते .. शराबी मर गया |
रवींद्र कालिया कहते हैं कि मैंने  रागदरबारी को पढ़कर प्रशंसा की और कहा कि “ बदलते हुए भारतीय गाँव का ऐसा सटीक चित्रण  इससे पूर्व न हुआ था |” इस पर वे आश्चर्यचकित मेरी  तरफ़ देखने लगे चूँकि परिमल के सदस्यों के ठीक विपरीत यह बात कही गई थी |
यह सही है कि श्रीलाल शुक्ल जी को पाठकों ने पहले मान्यता दी और पाठकों का प्रिय लेखक लंबे अरसे तक पारी खेलता है इसमें कोई संदेह नहीं |

श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व सरल,सहज और मौलिकता से भरपूर है | बनावट या कृत्रिमता से बुना, ओढ़ा नहीं गया | अधितर सेवानिवृत्ति से तात्पर्य आराम पसंदगी को माना जाता है किन्तु श्री लाल शुक्ल ने  तो लेखन की दमदार पारी  का आरंभ ही  अवकाश प्राप्ति के बाद किया |  अवधी,संस्कृत,हिंदी तथा अंग्रेजी भाषाओँ पर उनका पूर्ण अधिकार था वे किसी भी भाषा में फर्राटे से बोलने में सक्षम थे | जब किसी विषय पर डिटेल देते तो लोगों का मुँह खुला रह जाता | रवींन्द्र कालिया जी लिखते हैं कि उनका गद्य हिंदी का विशुद्ध गद्य है,  उसमें उर्दू अथवा अंग्रेजी की घुसपैठ नहीं है |  विशुद्ध भाषा में व्यंग्य लिखना टेढ़ी खीर है |  उनकी लेखनी की कशिश की एक बानगी देखिए --  ‘मुसाफिर के कंधे के बल जमीन पर आया’,  ... कमीज़ से  कंधा अपनी सीलन छोड़ कर पीठ पर झूल गया | ऐसी अनेक अभिव्यक्तियाँ हैं | जो पाठक को अभिभूत करती हैं |
 रवीन्द्र कालिया उनके बात कहने के ढंग पर मोहित थे वे कहते हैं कि श्री लाल शुक्ल काव्य की तरह गद्य की अदायगी करते हैं | रागदरबारी की रचना प्रक्रिया पर वह कुछ इस अंदाज में अपने विचार प्रकट करते हैं “ किताब लिखना दिमाग के लिए कठोर और शरीर के लिए कष्टप्रद है| इससे तंबाकू की लत पड़ जाती है | कैफीन का जरुरत से ज्यादा सहारा लेना पड़ता है | बवासीर ,बदहजमी, अनवरत दुश्चिंता और नामर्दी पैदा होती है | ‘फिर रागदरबारी’ इसने मुझे लगभग छ: साल बीमारी की हालत में रखा | उन गँवार चरित्रों के साथ दिन-रात रहते हुए मेरी जबान ख़राब हो गई | भद्र महिलाएँ खाने की मेज पर कभी-कभी मुझे भौंवे उठा कर देखने लगी | मैं परिवार से कतराने लगा | मेरी मुसीबत यह कि किताब लिखने  के लिए कोई जगह वाजिब ही नहीं जान पड़ती | अत: अपना मकान  बीबी,बच्चों,रिश्तेदारों आदि के लिए छोड़ कर अलग से दूसरा फ़्लैट लिया | वीराने में मोटर खड़ी करके उसकी सीट का महीनों इस्तेमाल किया .,दूर-दूर के डाक बंगलों के चक्कर  काटे यानी वह सब किया जो जिम्मेदार गृहस्थ कोई प्रेमिका रख उसके लिए करते हैं |
इस  एक उदाहरण से ही स्पष्ट हो जाता है कि  लेखन एक साधना है |
श्री लाल शुक्ल रंगीन मिज़ाजी थे |  वे रीतिकाल के रंग से बात आरम्भ करते | वे संगीत ,नाटक कला और फोटोग्राफी की भी जानकारी रखते थे | वे विविध व्यक्तित्व के धनी थे उनका  व्यक्तित्व पारदर्शी था | रवीन्द्र कालिया के अनुसार उनका स्वभाव  विनोदी,स्पष्टवादीऔर गुस्सेल  तो था  ही उनमें पुरानपंथी धर्मभीरु ब्राह्मण भी आलथी पालथी लगाकर विराजमान रहता | नवरात्रि में कुछ और तो क्या पानी भी पीते होंगे या नहीं यह बताना मुश्किल है |
इतना ही नहीं वे   दूसरों के दुःख को अपना दुःख मानने वाले भी थे  -- श्रीलाल जी को किसी लेखक की मज़बूरी का एहसास होता तो वह नेपथ्य से सहायता करते | रवीन्द्र कालिया जी लिखते हैं एक बार उन्होंने चर्चित कथाकार की बेटी  की शादी में सहायता की और कहा  “देखो उनसे इसका भूल से भी  जिक्र न करना कि मैंने सहायता की है |
पूछने पर कि ऐसा क्यों ? उनका जवाब था ..अव्वल तो जरुरत नहीं है | दूसरा मैं नहीं चाहता कि अकारण किसी को अपने एक टुच्चे एहसान से लाद दूँ |” इसे कहते हैं नेकी कर और दरिया में डाल |

श्रीलाल शुक्ल अच्छे पाठक भी थे | कृति अच्छी हो तो खुल कर प्रशंसा करते वे लेखकों का मनोबल बढ़ाते थे जैसे ममता कालिया की पुस्तक पर उन्होंने लिखा था “ बच्चा कहानी नोबल प्राइज स्टफ है| यह श्रीलाल शुक्ल जी का अपना अंदाज था | और रचना पसंद नहीं आई तो यह कहने में भी संकोच नहीं करते कि यह दो कौड़ी की रचना है और चूल्हे में फेंकने लायक है | वे एकदम खरे स्पष्टवादी थे |
इन सब के अतिरिक्त उनका समर्पण भाव देखते ही बनता है | पत्नी की बीमारी से वे टूट गए | पूर्ण आत्मीयता से गिरिजा जी की तीमारदारी में लगे रहते | रवीन्द्र कालिया जी के शब्दों में .... इस समय  श्रीलाल जी लेखक थे न आराम पसंद अवकाश प्राप्त अधिकारी वह मात्र पति थे ,प्रेमी थे,दोस्त थे | बदले हुए श्रीलाल शुक्ल थे | आज मस्त मलंग और बेफिक्र रहने वाले उद्वेलित थे | गिरिजा जी की बीमारी ने उनकी दिनचर्या ही बदल डाली थी | वे कहते नशे में नींद लग गई तो गिरिजा को कौन देखेगा ? अब तो उनकी एक ही मुराद थी कि गिरिजा स्वस्थ हो जाए | यह समर्पण भाव मेरे लिए एकदम नया था |
और भी बहुत सारी कही अनकही बातें है जो श्रीलाल शुक्ल के व्यक्तित्व में चार चाँद लगाती हैं |

आज के लिए बस इतना ही | इस महान व्यक्तित्व को नमन करते हुए मैं अपनी वाणी को विराम देती हूँ | मुझे कुछ कहने का अवसर प्रदान किया | धन्यवाद |













 

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