Saturday, April 11, 2020

सोच ...





Positive Thinking and the Brain - Youth Time Magazine
सोच एक मानसिक प्रक्रिया है | सोचने से विचार उत्पन्न होते हैं और विचार से ही दर्शन बनता है | सोच विचार एक प्रकार का मंथन है | मनुष्य के पास सोचने की अद्भुत क्षमता है जिसके आधार पर मनुष्य क्या कुछ नहीं कर सकता है | आज तक जितने भी परिवर्तन हुए हैं सब मनुष्य की सोच का ही परिणाम है |
सोच दो प्रकार की होती है |सकरात्मक और नकारात्मक | सकारात्मक सोच से संपूर्ण वातावरण को ऊर्जावान तथा स्फूर्तिदायक बना देती है | सकारात्मक सोच बर्फ की वो डली है जो देने वाले को भी ठंडा करती है तो लेने वाले को भी शीतल करती है | प्राचीनकाल से ही ऋषि महर्षियों ने अध्ययन के साथ चिंतन पर विशेष बल दिया था |
यही अंतर है कल और आज  के परिवेश में | भीषण संकट भी सकारात्मक सोच से आसानी से टाले  जाते थे |
आज छोटी सी समस्या भी हमसे नहीं सुलझाई जाती है | हम समस्या का समाधान खोजने के बजाय उससे होनेवाले परिणामों को भयावह बना लेते हैं | नकारात्मक विचारधारा समस्या को सुलझाने के बजाय उलझा देती है | आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में हर आदमी अपने में उलझा हुआ है | छोटी सी दुर्घटना को इतना ग्लोरिफाई किया जाता है कि चारों ओर निराशा,हताशा का अंधकार छा जाता है और मनुष्य उस अँधेरे में से निकलने का प्रयास ही भूल जाता है | तथा इसी निराशा भरे जीवन को अपनी नियती मान बैठता है | राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कहा था मनुष्य जैसा सोचता है वैसा बन जाता है | इस कथन में जीवन की सफलता दृष्टिगोचर होती है | मनुष्य क्यों इतना नकारात्मक सोच रहा है ? लोग कहेंगे आजकल का जमाना ही ऐसा हो गया है| भाई ही भाई का न रहा | यह सच है किंतु क्या सब ही ऐसे हो गए हैं नहीं ना! फिर कैसे कहा जा सकता है कि दुनिया ही ऐसी हो गई है ? इस निराशा से आचाछादित बादलों को केवल सकारात्मक सोच की किरण की हटा सकती है | मनुष्य जब जब विचारों का मंथन करता है तब ही अपने लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है | आजकल चारों ओर एक ऐसा वातावरण पनप रहा है जिसमें हताशा और निराशा ही नजर आती है क्यों क्योंकि जो विचार फ़ैल रहे हैं वे नकारात्मक सोच से उत्पन्न है अर्थात अविश्वसनीयता के आधार पर व्यक्ति अपनों और परायों में अंतर नहीं समझ सकता | प्रेम स्नेह अपनापन यह सब तो विश्वास की नीवं पर खड़े होते हैं जब आधार ही कमजोर हों तो आशा रूपी पायदान कैसे मजबूत होंगे |अब बात यह है की सोच कैसी हो जो समाज के विकास में सहायक हो, मनुष्य में मनुष्यत्व बनाए रक्खे | ऐसी सोच तार्किक सोच हो सकती है अर्थात वैज्ञानिक सोच जो सत्य पर आधारित हो | समाज के विकास के लिए तार्किक व स्वच्छ सोच जागरूकता लाती है, कुछ अच्छा और सुंदर बनाती है | मनुष्य अन्य प्राणियों से भिन्न है | हमारा मस्तिष्क सही और गलत की समझ रख सकता है जिसे बुद्धि करते हैं यह बुद्धि  और विवेक ही मनुष्य को श्रेष्ठ बना है |वैज्ञानिक ढंग से सोचना अर्थात अंधविश्वासों को नहीं मानना कुरीतियाँ,अंधविश्वास,पुरानी परिपाटी समाज के विकास को अवरुद्ध करते हैं | अत: हमें अच्छा सोचना चाहिए |

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