Saturday, April 11, 2020

एक आकांक्षा


गुड मॉर्निंग मैडम | गुड मॉनिंग | नमस्ते सर , नमस्ते-नमस्ते | इस प्रकार अभिनंदन स्वीकार करती हुई ताज़गी भरी मुस्कान लिए आकांक्षा प्रार्थना सभा की ओर जा रही थी | प्रार्थना सभा में कुछ बच्चों का राष्ट्रीय गीत लापरवाही से गाना उसे कभी अच्छा नहीं लगता | सोचती इस ‘वंदेमातरम’ ने देश में आजादी का अलख जगाया था,यह जागरण की प्रभात फेरी हुआ करता था,जिसने सारे देश को एकता के सूत्र में पिरोया था |यह आज हम भूलते जा रहे हैं | खैर सम्मान की भावना तो मन से आती है जोर जबरदस्ती से नहीं | प्रार्थना सभा हो चुकी थी | सभी छात्र  अपनी –अपनी कक्षाओं में चले गए | रजिस्टर और किताबें लेकर मिसेस आकांक्षा  ने भी कक्षा में प्रवेश किया | नमस्ते बच्चो! नमस्ते मैम |
आज हम क्या पढेंगे ? मैम पहले वाला चैप्टर तो पूरा हुआ ही नहीं | क्यों उसे तो हमने पढ़ लिया है | कहाँ था आपका ध्यान ? आकांक्षा ने कहा | अरे मैम मैं तो उस दिन आया ही नहीं था | क्यों ? वो ... पार्टी में देर हो गई  थी, इसलिए  सोता रहा | राहुल ने कहा | राहुल पार्टी तो ठीक है किंतु आपको  पढ़ाई पर भी ध्यान देना चाहिए  | पहले पाठ पढ़ लीजिए फिर आपकी सहायता करुँगी | लेकिन पढ़ने की जरुरत ही क्या है मैडम  बस प्रश्नोत्तर दे दीजिए शेखर ने अंगड़ाई लेते हुए कहा |
आकांक्षा कक्षा में आए बदलाव तथा  दिन पर दिन गिरते अनुशासन से पहले ही खफ़ा थी , आज तो उनका पारा चढ़ गया था | आप लोग पढ़ाई को समझते क्या हो ? शिक्षा प्राप्त करने का मतलब यह नहीं कि स्कूल में हाजरी पड़ जाए और रट्टा मारकर परीक्षा पास कर लें | माता-पिता की  जिस आशा से आते हो न तुम !.... मिसेस  आकांक्षा कुछ कहती कि घंटी बज उठी टर्न ... टर्न ..| वह खिन्न मन से पैर पटकती हुई कक्षा से बाहर आ गई | हाय ! नीरू  , हाय मैम | क्या आपका लीजर है अभी ? हाँ जी | चलो न चाय पीकर आते हैं | क्या बात है मैम बड़ी परेशान नजर आ रही हैं चाय का प्याला लेते हुए आखिर नीरू  ने पूछ ही लिया | हाँ आजकल पढ़ाने का बिलकुल मन नहीं करता , देखती नहीं हो बच्चे कैसे नोट्स की माँग करते हैं | कुछ समझना ही नहीं चाहते, स्वाध्ययन तो दूर की बात है | आखिर यह पीढ़ी कहाँ जाएगी?
मैम यह तो फैशन हो गया है | डोनेशन दे दो,दाखिला ले लो | करना क्या है, अंग्रेजी आ जाए,चटर – पटर , कम्प्यूटर कोर्स कर लो और क्या चाहिए ?
आज पूरा दिन आकांक्षा का मन नहीं लगा | बस आने वाली पीढ़ी और उसका आलस | यही सब सोचने में बीत गया |छुट्टी की घंटी कब बजी पता ही नहीं चला ,पर्स उठाया और घर चल दी | सिर दर्द से फटा जा रहा था | मुँह धोया एक कप गरमागरम चाय पी और अखबार उठाया आज तो अखबार भी नहीं देखा वह मन ही मन बुदबुदाई | लिच्छवी  आ चुकी थी | बीबीजी का बनाएँ, कुछ भी बना दो उसने अनमने मन से कहा | कुछ भी का मतलब का  होवत है ? किती बार कह रही मुँह पीरा (पीला) पड़ गया है तनिक खुली हवा में साँस ले लिया करो | आई तब गुलाबी रंग था, चेहरे का | हमको समझत नहीं आवे कि सारा दिन किताब ,पन्नों में का करत हो तुम | बोलते-बोलते लिच्छवी बैठ गई |
यह उसके रोज की उपदेश माला थी | जब तक वह मुझे सीख न दे दे तब तक वह कोई काम  शुरू नहीं करती | बस हो गया या अब और कुछ कहना बाकी है | हमको का कहना है बीबीजी ? बस सोच रहे ऐसे  कैसे  चलेगा ? पहाड़ सी जिंदगानी और चारो तरफ काले कोबरे | बस तोहार नमक खाया है , कह देते हैं  | तुम जैसे मेम साहब को हम का सीख देबे लगे |
अरे! छोड़ इन बातों को , बता तुमने पढ़ना शुरू किया कि नहीं | यह सुनकर उसके मुँह पर ताला लग गया | घायल हिरणी सी इधर-उधर देखने लगी| अरे! क्या हुआ ? ऊ दीदी बात ई है, कि हमार मरद ने तख्ती उठा के फैंक दी और कहत रहा कि बेसरम ई उमर मां सलेट लेती है ? ई नाटक-वाटक हमरे ईहाँ ना चली | तोहार काम है खाना बनाना और हमार मुनवा का धियान रखना बस | ईं सब बातन के अलावा ईहाँ तोहार कछु काम नाहीं समझी |
    ओफ्फो ! तुम यहाँ काम करती हो , सेठजी के यहाँ काम करती हो , कमा कर देती हो  फिर भी तेरे साथ ऐसा व्यवहार | घरों में काम करना बंद कर | अपने बच्चे का ध्यान रख और थोड़ा समय निकाल कर पढ़ना सीख| आकांक्षा ने समझाया | इतना सुनते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया , उदास हो गई वह | क्यों क्या हुआ ? ऐसा क्या कहा दिया मैंने ? बीबीजी बात ई है , वो बात ई है कि हमार मरद को पीने को दारू चाहे और ना मिले तो हमार जीना मुस्किल कहते – कहते उसका पल्लू सरक गया | कंधे पर नीली – नीली धारियाँ| उफ़ ! यह क्या है , कछु नाहीं बस ये तो ....औरत जात होने की सजा है | बीबीजी और कछु नाहीं | जल्दी से उठ  तत्परता से काम में जुट गई जैसे कुछ हुआ ही न हो | हम २१वीं सदी  में जी रहे हैं | एक तरफ स्त्री अंतरिक्ष में कदम धर चुकी हैं, एवरेस्ट पर परचम लहरा चुकी हैं तो दूसरी ओर लिच्छवी जैसी औरतें आदम ज़माने में जीने को बाध्य हैं| आकांक्षा ने किताबों को उठा कर रखा, बिखरे बालों का जुड़ा बनाया और किचन की ओर बढ़ गई | अब तक लिच्छवी जा चुकी थी और मैं सोचती रह गई | स्त्री होने का मतलब क्या यही है ? काम करो, अपमान सहो, मार खाओ और फिर इन सब को किस्मत का जामा पहनाकर सब भूल जाओ |
घड़ी ने चार बजने की सूचना दी | आकांक्षा झट से उठी , ईश्वर की आराधना की कि हे ईश्वर आज का दिन अच्छा हो | मन की शक्ति देना, मन विजय करें .... ये पंक्तियाँ कानों में गूंज रही थी | अद्भुत शक्ति उसे आगे बढ़ा रही थी | आकांक्षा आश्वस्त थी | आज वह किसी भी घटना से विचलित नहीं होगी, हतोत्साहित नहीं होगी बल्कि कुछ ऐसे प्रयास करेगी जिससे भटके हुए बच्चों को राह दिखाएगी, वातावरण को अच्छा करेगी | बस के साथ ही विचारों की यात्रा अविरल गति से चल पड़ी थी | रोजाना की तरह सब कुछ समान ही था | कक्षा में दाखिल होते ही आकांक्षा ने चहक कर कहा | बच्चो ! आज हम राजा शिवी और दधिची के बारे में जानेंगे|  पक्षी के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं का मांस देने के लिए तैयार हो गए थे राजा शिवी | अच्छा तो बताइए कि इस प्रसंग से हमें क्या प्रेरणा मिलती है ? आराधना ने कहा मैडम, परोपकार करना चाहिए | शाबाश ! यश आपने क्या सीखा ? मैडम राजा को ज्ञान नहीं था| एक कबूतर की जान बचाने के लिए  खुद की जान जोखिम में डालना कहाँ की अकलमंदी है? और कक्षा  हँस पड़ी | आकांक्षा ने जान लिया था कि कहीं कुछ घट रहा है जो इन बच्चों को प्रेम,अहिंसा,त्याग जैसे मूल्यों  से दूर ले जा रहा है | वह मन ही मन दिखावे की संस्कृति को कोसने लगी | यह संस्कृति तो बच्चों के भावी जीवन को खोखला कर देगी | जंक फूड जोंक की तरह चिपक गया है इनके दिमांक में | इसी उधेड़बुन में दिन बीतते रहे | आज समाचार देखकर उसकी रूह काँप गई| दिल्ली में घटी घटना से वह पगला गई | सभी अपना क्षोभ व्यक्त कर रहे थे | आए दिन ऐसी घटनाएँ घट रही हैं उसके मूल में शिक्षा की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिह्न लग गए हैं| हम  भूमंडलीकरण के इस दौर से गुजर रहे हैं, ग्लोबल वार्मिंग की चिंता जता रहे हैं लेकिन क्या अपने पैरों में लगी आग दिखाई नहीं देती | हाँ आप बिलकुल ठीक कह रही हैं आकांक्षा जी | मि. रघु ने कहा | सचमुच माहोल गलीच हो गया है नहीं मिस आरिफा ने कहा | हाँ यह सब हो रहा है किन्तु क्या हम यूँ ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे ? मि. कुलकर्णी बोले अरे ! मैडम यह सब ऐसा ही चलता रहेगा | आप क्यों इतना टेंशन लेती हैं हम आ रहे हैं,पोर्शन करा रहे हैं और क्या कर सकते हैं, ट्यूशन दे रहे हैं | बच्चे पास हो रहे हैं ना! ये अब उनकी किस्मत है कि वे क्या बने कैसे बने ?  
अरे ! इसका मतलब कुछ आदर्श नहीं सब प्रैक्टिकल, कोरा प्रैक्टिकल हो गया है | ये क्यों भूल जाते हैं कि समाज में यदि कुछ है तो वह आदर्श ही है अन्यथा कोरी व्यवहारिकता ने तो समाज को डुबाया ही है| हमारा कर्तव्य है कि बच्चों में संस्कार का बीज बोएं | ‘गुरु कुम्हार है, शिष्य कुंभ’ ये याद रखना होगा | आकांक्षा ने मन ही मन ठान लिया था हमें ही भटकों को रास्ता दिखाना होगा, हमें ही कुछ  करना होगा....|
आखिर मन में एक आकांक्षा है जो , मन में संकल्प , एक विश्वास लेकर बुदबुदाने लगी ---
  होकर मायूस यों न शाम सा ढलते रहिए |
  ज़िंदगी भोर है एक, सूरज सा निकलते रहिए ||
इन पक्तियों को गुनगुनाती वह चल पड़ी ....| आकांक्षा को पूरी करने |


डॉ. मंजु शर्मा,
अलवाल, हैदराबाद |





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