गुड मॉर्निंग मैडम | गुड मॉनिंग | नमस्ते सर ,
नमस्ते-नमस्ते | इस प्रकार अभिनंदन स्वीकार करती हुई ताज़गी भरी मुस्कान लिए
आकांक्षा प्रार्थना सभा की ओर जा रही थी | प्रार्थना सभा में कुछ बच्चों का
राष्ट्रीय गीत लापरवाही से गाना उसे कभी अच्छा नहीं लगता | सोचती इस ‘वंदेमातरम’
ने देश में आजादी का अलख जगाया था,यह जागरण की प्रभात फेरी हुआ करता था,जिसने सारे
देश को एकता के सूत्र में पिरोया था |यह आज हम भूलते जा रहे हैं | खैर सम्मान की भावना
तो मन से आती है जोर जबरदस्ती से नहीं | प्रार्थना सभा हो चुकी थी | सभी छात्र अपनी –अपनी कक्षाओं में चले गए | रजिस्टर और
किताबें लेकर मिसेस आकांक्षा ने भी कक्षा
में प्रवेश किया | नमस्ते बच्चो! नमस्ते मैम |
आज हम क्या पढेंगे ? मैम पहले वाला चैप्टर तो
पूरा हुआ ही नहीं | क्यों उसे तो हमने पढ़ लिया है | कहाँ था आपका ध्यान ? आकांक्षा
ने कहा | अरे मैम मैं तो उस दिन आया ही नहीं था | क्यों ? वो ... पार्टी में देर
हो गई थी, इसलिए सोता रहा | राहुल ने कहा | राहुल पार्टी तो ठीक
है किंतु आपको पढ़ाई पर भी ध्यान देना
चाहिए | पहले पाठ पढ़ लीजिए फिर आपकी
सहायता करुँगी | लेकिन पढ़ने की जरुरत ही क्या है मैडम बस प्रश्नोत्तर दे दीजिए शेखर ने अंगड़ाई लेते
हुए कहा |
आकांक्षा कक्षा में आए बदलाव तथा दिन पर दिन गिरते अनुशासन से पहले ही खफ़ा थी ,
आज तो उनका पारा चढ़ गया था | आप लोग पढ़ाई को समझते क्या हो ? शिक्षा प्राप्त करने
का मतलब यह नहीं कि स्कूल में हाजरी पड़ जाए और रट्टा मारकर परीक्षा पास कर लें |
माता-पिता की जिस आशा से आते हो न तुम !....
मिसेस आकांक्षा कुछ कहती कि घंटी बज उठी
टर्न ... टर्न ..| वह खिन्न मन से पैर पटकती हुई कक्षा से बाहर आ गई | हाय ! नीरू , हाय मैम | क्या आपका लीजर है अभी ? हाँ जी |
चलो न चाय पीकर आते हैं | क्या बात है मैम बड़ी परेशान नजर आ रही हैं चाय का प्याला
लेते हुए आखिर नीरू ने पूछ ही लिया | हाँ
आजकल पढ़ाने का बिलकुल मन नहीं करता , देखती नहीं हो बच्चे कैसे नोट्स की माँग करते
हैं | कुछ समझना ही नहीं चाहते, स्वाध्ययन तो दूर की बात है | आखिर यह पीढ़ी कहाँ
जाएगी?
मैम यह तो फैशन हो गया है | डोनेशन दे दो,दाखिला
ले लो | करना क्या है, अंग्रेजी आ जाए,चटर – पटर , कम्प्यूटर कोर्स कर लो और क्या
चाहिए ?
आज पूरा दिन आकांक्षा का मन नहीं लगा | बस आने
वाली पीढ़ी और उसका आलस | यही सब सोचने में बीत गया |छुट्टी की घंटी कब बजी पता ही
नहीं चला ,पर्स उठाया और घर चल दी | सिर दर्द से फटा जा रहा था | मुँह धोया एक कप
गरमागरम चाय पी और अखबार उठाया आज तो अखबार भी नहीं देखा वह मन ही मन बुदबुदाई |
लिच्छवी आ चुकी थी | बीबीजी का बनाएँ, कुछ
भी बना दो उसने अनमने मन से कहा | कुछ भी का मतलब का होवत है ? किती बार कह रही मुँह पीरा (पीला) पड़
गया है तनिक खुली हवा में साँस ले लिया करो | आई तब गुलाबी रंग था, चेहरे का |
हमको समझत नहीं आवे कि सारा दिन किताब ,पन्नों में का करत हो तुम | बोलते-बोलते लिच्छवी
बैठ गई |
यह उसके रोज की उपदेश माला थी | जब तक वह मुझे सीख
न दे दे तब तक वह कोई काम शुरू नहीं करती |
बस हो गया या अब और कुछ कहना बाकी है | हमको का कहना है बीबीजी ? बस सोच रहे ऐसे कैसे
चलेगा ? पहाड़ सी जिंदगानी और चारो तरफ काले कोबरे | बस तोहार नमक खाया है ,
कह देते हैं | तुम जैसे मेम साहब को हम का
सीख देबे लगे |
अरे! छोड़ इन बातों को , बता तुमने पढ़ना शुरू किया
कि नहीं | यह सुनकर उसके मुँह पर ताला लग गया | घायल हिरणी सी इधर-उधर देखने लगी|
अरे! क्या हुआ ? ऊ दीदी बात ई है, कि हमार मरद ने तख्ती उठा के फैंक दी और कहत रहा
कि बेसरम ई उमर मां सलेट लेती है ? ई नाटक-वाटक हमरे ईहाँ ना चली | तोहार काम है
खाना बनाना और हमार मुनवा का धियान रखना बस | ईं सब बातन के अलावा ईहाँ तोहार कछु
काम नाहीं समझी |
ओफ्फो
! तुम यहाँ काम करती हो , सेठजी के यहाँ काम करती हो , कमा कर देती हो फिर भी तेरे साथ ऐसा व्यवहार | घरों में काम
करना बंद कर | अपने बच्चे का ध्यान रख और थोड़ा समय निकाल कर पढ़ना सीख| आकांक्षा ने
समझाया | इतना सुनते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया , उदास हो गई वह | क्यों क्या हुआ ?
ऐसा क्या कहा दिया मैंने ? बीबीजी बात ई है , वो बात ई है कि हमार मरद को पीने को
दारू चाहे और ना मिले तो हमार जीना मुस्किल कहते – कहते उसका पल्लू सरक गया | कंधे
पर नीली – नीली धारियाँ| उफ़ ! यह क्या है , कछु नाहीं बस ये तो ....औरत जात होने
की सजा है | बीबीजी और कछु नाहीं | जल्दी से उठ तत्परता से काम में जुट गई जैसे कुछ हुआ ही न हो
| हम २१वीं सदी में जी रहे हैं | एक तरफ
स्त्री अंतरिक्ष में कदम धर चुकी हैं, एवरेस्ट पर परचम लहरा चुकी हैं तो दूसरी ओर लिच्छवी
जैसी औरतें आदम ज़माने में जीने को बाध्य हैं| आकांक्षा ने किताबों को उठा कर रखा,
बिखरे बालों का जुड़ा बनाया और किचन की ओर बढ़ गई | अब तक लिच्छवी जा चुकी थी और मैं
सोचती रह गई | स्त्री होने का मतलब क्या यही है ? काम करो, अपमान सहो, मार खाओ और
फिर इन सब को किस्मत का जामा पहनाकर सब भूल जाओ |
घड़ी ने चार बजने की सूचना दी | आकांक्षा झट से
उठी , ईश्वर की आराधना की कि हे ईश्वर आज का दिन अच्छा हो | मन की शक्ति देना, मन
विजय करें .... ये पंक्तियाँ कानों में गूंज रही थी | अद्भुत शक्ति उसे आगे बढ़ा
रही थी | आकांक्षा आश्वस्त थी | आज वह किसी भी घटना से विचलित नहीं होगी, हतोत्साहित
नहीं होगी बल्कि कुछ ऐसे प्रयास करेगी जिससे भटके हुए बच्चों को राह दिखाएगी, वातावरण
को अच्छा करेगी | बस के साथ ही विचारों की यात्रा अविरल गति से चल पड़ी थी | रोजाना
की तरह सब कुछ समान ही था | कक्षा में दाखिल होते ही आकांक्षा ने चहक कर कहा |
बच्चो ! आज हम राजा शिवी और दधिची के बारे में जानेंगे| पक्षी के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं का मांस
देने के लिए तैयार हो गए थे राजा शिवी | अच्छा तो बताइए कि इस प्रसंग से हमें क्या
प्रेरणा मिलती है ? आराधना ने कहा मैडम, परोपकार करना चाहिए | शाबाश ! यश आपने
क्या सीखा ? मैडम राजा को ज्ञान नहीं था| एक कबूतर की जान बचाने के लिए खुद की जान जोखिम में डालना कहाँ की अकलमंदी है?
और कक्षा हँस पड़ी | आकांक्षा ने जान लिया
था कि कहीं कुछ घट रहा है जो इन बच्चों को प्रेम,अहिंसा,त्याग जैसे मूल्यों से दूर ले जा रहा है | वह मन ही मन दिखावे की
संस्कृति को कोसने लगी | यह संस्कृति तो बच्चों के भावी जीवन को खोखला कर देगी |
जंक फूड जोंक की तरह चिपक गया है इनके दिमांक में | इसी उधेड़बुन में दिन बीतते रहे
| आज समाचार देखकर उसकी रूह काँप गई| दिल्ली में घटी घटना से वह पगला गई | सभी
अपना क्षोभ व्यक्त कर रहे थे | आए दिन ऐसी घटनाएँ घट रही हैं उसके मूल में शिक्षा
की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिह्न लग गए हैं| हम भूमंडलीकरण के इस दौर से गुजर रहे हैं, ग्लोबल
वार्मिंग की चिंता जता रहे हैं लेकिन क्या अपने पैरों में लगी आग दिखाई नहीं देती |
हाँ आप बिलकुल ठीक कह रही हैं आकांक्षा जी | मि. रघु ने कहा | सचमुच माहोल गलीच हो
गया है नहीं मिस आरिफा ने कहा | हाँ यह सब हो रहा है किन्तु क्या हम यूँ ही हाथ पर
हाथ धरे बैठे रहेंगे ? मि. कुलकर्णी बोले अरे ! मैडम यह सब ऐसा ही चलता रहेगा | आप
क्यों इतना टेंशन लेती हैं हम आ रहे हैं,पोर्शन करा रहे हैं और क्या कर सकते हैं,
ट्यूशन दे रहे हैं | बच्चे पास हो रहे हैं ना! ये अब उनकी किस्मत है कि वे क्या
बने कैसे बने ?
अरे ! इसका मतलब कुछ आदर्श नहीं सब प्रैक्टिकल, कोरा
प्रैक्टिकल हो गया है | ये क्यों भूल जाते हैं कि समाज में यदि कुछ है तो वह आदर्श
ही है अन्यथा कोरी व्यवहारिकता ने तो समाज को डुबाया ही है| हमारा कर्तव्य है कि
बच्चों में संस्कार का बीज बोएं | ‘गुरु कुम्हार है, शिष्य कुंभ’ ये याद रखना होगा
| आकांक्षा ने मन ही मन ठान लिया था हमें ही भटकों को रास्ता दिखाना होगा, हमें ही
कुछ करना होगा....|
आखिर मन में एक आकांक्षा है जो , मन में संकल्प ,
एक विश्वास लेकर बुदबुदाने लगी ---
होकर
मायूस यों न शाम सा ढलते रहिए |
ज़िंदगी
भोर है एक, सूरज सा निकलते रहिए ||
इन पक्तियों को गुनगुनाती वह चल पड़ी ....|
आकांक्षा को पूरी करने |
डॉ. मंजु शर्मा,
अलवाल, हैदराबाद |
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