Saturday, April 11, 2020

आस्था



विश्वास से यदि किसी भी घटना को बिना आधार के रूप में मानना या यों कहें कि आस्था में विश्वास भी है तो अंध विश्वास भी | अत: आस्था और अंधविश्वास में कोई अंतर नहीं होता | आस्था किसी में भी हो सकती है | जहाँ आस्था है वहाँ किसी का अस्तित्व जरुर है चाहे वह व्यक्ति हो , महापुरुष हो ,टोना टोटका,तंत्र – मंत्र या फिर धार्मिक विश्वास | आस्था को भले ही हम अतिविश्वास या अंधविश्वास कह दें किन्तु उसके सकारात्मक रूप को भी नकारा नहीं जा सकता | इतिहास के पन्नों को तनिक उलटिए आस्था और विश्वास के अनुपम उदाहारण देखने को मिल जाएँगे | एक पत्थर में ईश्वर की मूरत देखना, क्या आस्था नहीं है? जो आस्था और विश्वास की धरती पर श्रद्धा और प्रेम के अंकुर उत्पन्न करती है फलस्वरूप भक्ति रूपी वृक्ष की छाया में मनुष्य स्वयं को ऊर्जावान तथा आश्वस्त पाता है | हाँ शबरी की आस्था ही उसकी प्रतीक्षा थी | जिसने भगवान श्रीराम को झूठे बेर तक खिला दिए| भक्ति की वह पराकाष्ठा बिना आस्था के नहीं होती| साईं बाबा ने जो एक फ़क़ीर थे, लोगों के अंतस में कैसे पहुंचे आस्था द्वारा | आस्था किसमें  हो यह प्रश्न  बार - बार खड़ा हो जाता है | हाँ आस्था गीता में हो, कुरान में हो,गुरुग्रंथ साहेब में हो या फिर बाइबिल में | ये पवित्र ग्रन्थ मनुष्यता को बचाए रखने पर बल देते हैं | एक घायल जीव के प्रति महात्मा बुद्ध की आस्था ही तो थी जिसने उन्हें शांति और अहिंसा का मुकुट प्रदान किया |
इस संदर्भ में एक कहानी याद आती है | जब विवेकानंद राजा जयसिंह से मिलने गए तो कुछ देर के लिए उन्हें प्रतीक्षा करनी पड़ी | इस बीच वहाँ एक व्यक्ति बैठा था | उन्होंने विवेकानंद से  कि कहा, स्वामी जी आप भी पत्थर में ईश्वर का होना मानते हैं |आपको यह शोभा नहीं देता | स्वामी जी  मुस्कराए उन्होंने कहा क्या आप राजा जी का कोई चित्र ला सकते हैं | उन्होंने चित्र प्रस्तुत किया, स्वामी जी ने कहा, इस पर थूकिए | उस व्यक्ति ने झट से कहा यह आप क्या कह रहे हैं? ये तो हमारे राजा जी का चित्र है | स्वामी जी ने कहा इस चित्र में राजा होने की बात कहते हैं तो फिर पत्थर में ईश्वर क्यों नहीं | यह  घटना आस्था का सुन्दर उदाहारण है | आस्था का होना आवश्यक है | यह एक ऐसी अनुभूति है जिसके सहारे हम संस्कृति को बचाए रख सकते हैं क्योंकि आस्था मस्तिष्क की नहीं मन की पुकार है |
भारतीय संस्कृति मानवता का संगम है | आज भी हमारे यहाँ नित नए व्रत त्योहार पूजा पाठ होते रहते हैं | वे किसी न किसी रूप में उस आस्था रूपी डोर से बंधे हैं |
पौराणिक मान्यताएँ हैं गंगा स्नान, छट पूजा. कुंभ स्नान और नाना प्रकार से की गई पूजा आराधना यह सब आस्था का प्रतिफल है इतना ही नहीं पूजा अर्चना स्नान ध्यान ये सब वैज्ञानिक प्रमाण भी रखते हैं किन्तु जब हम  इन पवित्र धारणाओं  को अपने स्वार्थवश मानते हैं तब श्रद्धा और आस्था जैसे भावों को ठेस पहुंचती है | प्राचीनकाल में गंगा वेगवती बहती जाती थी | आज मनुष्य की बदलती जीवन शैली या धारणाओं ने उसे कलुषित कर दिया है | इसी का परिणाम है कि गंगा मैली नजर आ रही है | नदियाँ सूख रही है | या कीचड़ में परिवर्तित होने के कगार पर है | इसलिए आज पुनरवलोकन की आवशयकता है | विचारणीय है कि कुछ पौराणिक मान्यताएं या धारणाएं धूमिल होती दिखाई दे रही हैं| प्राकृतिक स्रोत कूड़े करकट से भरे दुर्गन्ध युक्त हों रहे हैं इस परिवेश को बदलना होगा | इसी के चलते आज की पीढ़ी प्रश्न करती है कि इस गंदगी में स्नान से क्या लाभ ? इतने व्रतों से क्या फायदा जो हमें कमजोर बनाते हैं? इस दृष्टिकोण से हमारी भावनाओं को ठेस पहुँचती है किंतु कहीं न कहीं लगता है यह भी तो सही है क्योंकि आज ऐसा वातावरण उत्पन्न हो रहा है |हमें अंधविश्वासों में नहीं बल्कि विश्वास और आस्था के सहारे युवा पीढ़ी को समझाना होगा | और हमें भी अच्छाई में, सच्चाई में, विश्वास तथा  आस्था रखनी होगी जिससे  ईश्वर की यह सुन्दर सृष्टि बनी रहे, बची रहे |अन्यथा वह दिन दूर नहीं कि पूरा संसार आतंक और घृणा से झुलस जाएगा | अन्तत: हमें आस्था, प्रेम और विश्वास को बनाए रखना होगा |
डॉ. मंजु शर्मा,
अलवाल |

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