Saturday, April 11, 2020

गुरु ब्रम्ह है, दीपक है, मार्गदर्शक है .....

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शिक्षक दिवस पर अद्यापकों को सम्मानित होते देख हर्ष हुआ और होना भी चाहिए| आखिर शिक्षक पद है ही  नोबेल | भारत भूमि ने गुरु को ईश्वर के समक्ष माना है | विष्णु शर्मा, चाणक्य, शंकराचार्य जैसे शिक्षकों ने भारत के कलेवर को ही बदल दिया था | नैतिकता की नींव पर स्वर्णिम भारत खड़ा किया | क्या ऐसे गुरु एवं गुरुओं के प्रति वो रुतबा आज है? आज अध्यापक एक सामान्य कर्मचारी बनकर रह गया है | आज की शिक्षा पद्दति में  वह ज्ञान और  संस्कारों का पोषण नहीं करता बल्कि डाटा इक्कठा करता है | उसका आर्थिक तंत्र डावाडोल है शायद यही कारण है कि आज शिक्षक बनने के लिए दस बार सोचा जाता है |
वह विकास की दौड़ में बेतहाशा भागा जा रहा है, भागने को विवश है चूँकि पढ़ाने से ज्यादा वह अन्य कार्यों में उलझा हुआ है | ऐसी स्तिथि में क्या वह इंसानियत की डगर पर चलना सिखा सकता है ? खैर, पूर्ण अन्धकार नहीं हुआ है, है अभी भी कुछ आशा की किरणें बाकी,  जो शिक्षक के जीवन में उजले भविष्य का पैगाम लाने को आतुर है | आखिर  उम्मीद पर ही तो  दुनिया कायम है |


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