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शिक्षक दिवस पर अद्यापकों को सम्मानित होते देख हर्ष हुआ और होना भी चाहिए| आखिर शिक्षक पद है ही नोबेल | भारत भूमि ने गुरु को ईश्वर के समक्ष
माना है | विष्णु शर्मा, चाणक्य, शंकराचार्य जैसे शिक्षकों ने भारत के कलेवर को ही
बदल दिया था | नैतिकता की नींव पर स्वर्णिम भारत खड़ा किया | क्या ऐसे गुरु एवं
गुरुओं के प्रति वो रुतबा आज है? आज अध्यापक एक
सामान्य कर्मचारी बनकर रह गया है | आज की शिक्षा पद्दति में वह ज्ञान और संस्कारों का पोषण नहीं करता बल्कि डाटा इक्कठा
करता है | उसका आर्थिक तंत्र डावाडोल है शायद यही कारण है कि आज शिक्षक बनने के
लिए दस बार सोचा जाता है |
वह विकास की दौड़ में बेतहाशा भागा जा रहा है, भागने को विवश है चूँकि पढ़ाने से
ज्यादा वह अन्य कार्यों में उलझा हुआ है | ऐसी स्तिथि में क्या वह इंसानियत की डगर
पर चलना सिखा सकता है ? खैर, पूर्ण अन्धकार नहीं हुआ है, है अभी भी कुछ आशा की किरणें बाकी, जो शिक्षक के जीवन में उजले भविष्य का पैगाम
लाने को आतुर है | आखिर उम्मीद पर ही
तो दुनिया कायम है |
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