“बम की मार, कितनी बार ?
बार-बार और सब बीमार |”
मनुष्य अपने किए को कितनी
आसानी से भूल जाता है। अरे ! यह चीख ? यह
महाशक्तियों के अहम से लटकी तीसरे विश्व
युद्ध की दस्तक तो नहीं ? हाँ आलम तो यही बन रहा है, रूस और यूक्रेन लड़कर अपने
पैरों पर कुल्हाड़ी तो मार ही रहे हैं लेकिन दूसरों की जड़ें भी तो खोद रहे हैं ।
कोरोना के दंश की दहशत अभी कम भी नहीं हुई कि ये धमाके !
विज्ञान विकास का ही नहीं, विनाश
का भी एक रूप है। यह स्पष्ट देखा जा सकता है। विचारणीय है कि यह लड़ाई लंबी चली तो
‘क्या क्या आएगा इसकी लपेट में,चपेट में ? जाहिर है पर्यावरण भी इसकी चपेट में
आएगा ही । पर्यावरण संरक्षण की मुहिमें धराशाही हो जाएँगी । ‘जल,जंगल,जमीन और जीवन’
जंग की वेदी पर स्वाहा हो जाएँगे। हटा दो- सारे होर्डिंग, विज्ञापन,पाठ सभी जहाँ से
बच्चा पर्यावरण बचाव का पाठ सीखता है। दुनिया को मुट्ठी में करने वाली ताकतों से
कोई यह पूछे कि तोपों की गूंज से कोई
सिसकता होगा, आग की लपटों में कोई चिड़िया भी झुलसती होगी....
“कौन शासन से कहेगा,कौन समझाएगा ,
एक चिड़िया इन धमाकों से सिहरती है । (दुष्यंत)
बारूदों के ढेर पर बैठे हो, क्यों
भूल जाते हो कि तुम्हारी यह खुन्नस आम आदमी का निवाला छीन लेगी, सागर के सीने पर रसायनों
की परतें जम जाएँगी, बच्चों के हाथों से
किताबें फिसल जाएँगी। महँगाई की मार और जिजीविषा टकराएँगी। समाज का पहिया डगमगाने
लगेगा,अनैतिक कार्यों की राह खुलेंगी, मानवीय समवेदनाएँ दाग-दाग होंगी, फिज़ाओं में
मासूमों की मौत का पैगाम घूमेगा।
फिर ? फिर क्या होगा ??
युद्धों की परिणति नए युद्धों की पृष्ठभूमि तैयार करने में जुट
जाएँगी ।
काश ! तुम यह समझ पाते !!
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