हवा में तैरता जहर नामक झलकी आपको
दिखाते हैं -----
धरती का प्रवेश --- मै धरती, वसुधा,
वसुंधरा | कितना सुन्दर रूप है मेरा | पशु-पक्षी मानव सबका यहाँ है बसेरा |
मानव का प्रवेश – हा हा हा --- विकास
ही विकास चारों ओर विकास | चाँद क्या मंगल पर पहुंच रहा हूँ| वहाँ भी इमारतें बनाऊंगा खूब लाभ कमाऊंगा | गगन
चुम्बी इमारतें वाह ! वाह ! (खांसता है)
२०५० की धरती का प्रवेश – हैरान |
अपनी सुविधाओं के लिए तुमने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है |
मानव – तुम कौन हो ?
धरती – मैं धरती माँ हूँ | जिसके पान से तुम पले बढ़े, जिसके आँचल
में खेले कूदे वही धरती हूँ मैं|
मानव – ओह यू मीन अर्थ !
धरती – अरे अक्ल के अंधे तुमने मेरा
अर्थ समझा ही कब है ?
मानव – लेकिन तुम तो काली कलूटी हो
गई हो | मैंने तो पढ़ा था धरती तो हरी भरी
सुन्दर होती है |
धरती – हाँ, थी मैं हरि भरी किंतु आज
मेरी इस हालत के जिम्मेदार तुम हो | तुम्हारे लोभ, लालच ने मुझे छलनी कर दियाहै बंजर कर दिया है |
मानव – लेकिन मैंने तो विकास किया है |
धरती – हँसते हुए – विकास | अरे
दुष्ट मानव,विकास नहीं विनाश किया है |
बीमार का प्रवेश – अब भुगतो | बोया
पेड़ बबुल का तो आम कहाँ से खाए |
धरती – कितने फल फूल हम देते हैं ,
फिर भी अनजान बने हो |
रो रो कर पुकार रही हूँ फिर भी ये हाल कर
रहे हो |
मानव – सर पकड़ कर, हे भगवान् मैंने
क्या किया, सुखों की आड़ में जीवों को मार दिया |
धरती - अब भी समय है जागो ... हरित हारम
नहीं सुना ?
गली-गली में पेड़ लगाओ हर प्राणी में
आस जगाओ | जागो बच्चो, जागो मानव
वसुंधरा पर सवास्थ्य शक्ति का आधार हो
उपाय करो कुछ ऐसा
कोई प्राणी धरती पर ना हो बीमार हो |
क्योंकि क्योंकि पर्यावरण ही जीवन आधार है |
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