Sunday, April 12, 2020

‘नासिरा शर्मा के उपन्यास ‘कुइंयाजान’ में पर्यावरण विमर्श’




नासिरा शर्मा Nasira Sharma | Indian literature ...
                                                 

इक्सवीं शताब्दी में साहित्य के सरोकारों का जो नया विस्तार हुआ है | उसके परिणामस्वरूप पिछली शताब्दी तक हाशिए पर रहे कई प्रश्न अब केंद्र में आ गए हैं | कुछ समय पहले तक पर्यावरण से जुड़े मुद्दे उतने महत्वपूर्ण नहीं थे जितने वे आज हो गए हैं दरअसल विकास और प्रगति की अंधी दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति और पर्यावरण का दोहन तो किया लेकिन उसकी क्षतिपूर्ति के बारे में लंबे समय तक बिल्कुल नहीं सोचा | अब क्योंकि पर्यावरण प्रदूषण के कारण पृथ्वी और मनुष्य का अस्तित्व ही खतरे में पड़ता दिखाई देने लगा है तो समाज ने पर्यावरण को बचाने के बारे में सोचना शुरू किया है | यही वह बिंदु है जहाँ से पर्यावरण विमर्श की शुरुआत होती है | कल तक उपेक्षित रहा पर्यावरण आज मनुष्य के अस्तित्व के साथ जुड़ जाने के कारण अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय हो गया है |
पर्यावरण चेता साहित्यकार इसलिए विभिन्न विधाओं के माध्यम से समाज को चेतावनी दे रहे हैं और इस दिशा में सक्रीय होने के लिए प्रेरित कर रहे हैं|
हिंदी की वरिष्ठ कथाकार नासिरा शर्मा ने अपने उपन्यास कुइंयाजान (२००५) में जल से जुड़ी पर्यावरण चेतना को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की है | नगरीकरण और औद्योगिककरण ने प्रकृति के इस तत्व को किस प्रकार दुर्लभ तत्व बना दिया है यह विचारणीय विषय है | उपन्यास में पंडित जी इसी चिंता को व्यक्त करते हुए कहते हैं ......
“घरों में हैंडपाइप थे, खराब पड़े थे | पानी की हाय-तौबा मची थी | शिव मंदिर के पुजारी भी बिना नहाए परेशान बैठे थे | नल की टोंटी पर कई बार कौआ पानी की तलाश में आ-आकर बैठ-उड़ चुका था | गर्मी ऐसी कि पसीना पानी की तरह शरीर से बह रहा था | पंडित जी नल खोलते, फिर बंद कर बडबडा उठते, “पग-पग रोटी, डग-डग नीर ... मगर अब ...ई शहर का कईसा हाल बना  दिए हो भगवान | न पानी न रोटी !”(11)

जल और जीवन अन्योनाश्रित है | नासिरा शर्मा द्वारा रचित उपन्यास ‘कुइंयाजन’ जल का आधार खोजती रचना है | पानी चंचल है मन की तरह | मन की हलचल में जीवन की सहजता विद्यमान है | जल सूखा तो मन सूखा और मन सूखा तो सब सूखा अर्थात नीरस जीवन | कुइंयाजान की धूरी जल  है | जिसके इर्द-गिर्द बावर्चीखाने से लेकर श्मशान तक के अंतर्मन की व्यथा-गाथा  घूमती रहती है | जल केंद्र में है | मनुष्य का जीवनाधार पानी है | इस उपन्यास में लेखिका ने जल संकट की भयावता से आगाह किया है | संस्कृत ग्रन्थ, राजस्थानी लोक जीवन की कथाओं  जैसे ढोला - मारू द्वारा यह प्रमाणित किया है  कि हमारे देश में जल की कमी नहीं है | अपनी इसी जिजीविषा के चलते मनुष्य जल संरक्षण करता आया है | बड़ी-बड़ी बावड़ी कुएँ ताल- तलैए इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं |किंतु आज यही विषय सोचनीय हो गया है , क्योंकि जब से मनुष्य परंपरागत जल स्रोतों की  उपेक्षा करने लगा है तब से ही प्रकृति में असंतुलन आ गया है | पानी का संकटचरों ओर मंडरा रहा  है | गंगा का पानी सूखता जा रहा है | जल संकट आज गंभीर समस्या बन गया है | जल संकट की जड़ की ओर संकेत करते हुए लेखिक कहती है ... “यह बड़ी खतरनाक समस्या हमारे सामने आ खड़ी हुई है| इसके प्रति आम लोगों में जागृति बहुत जरुरी है| वरना यह पानी भी दूध के भाव बिकेगा और एक ऐसा समय आएगा जब अपनी ही नदियों का पानी पीना, वह भी खरीदकर, बहुत बड़ी अय्याशी समझा जाएगा |” (103)
विज्ञान के आविष्कारों ने नि:संदेह अनेक चमत्कार किए हैं , अनेक सुख -सुविधाओं की चादर बिछाई है किंतु भोग-विलास की इस तृष्णा को पूरा करने में मनुष्य ने प्रकृति के साथ शत्रुता का सा व्यवहार कर उसका दोहन इस कदर किया है कि प्रकृति  विकराल रूप धारण कर रही है यही कारण है कि बाढ़ , तूफ़ान बिन मौसम की बरसातें  सब अनचाहा हो रहा है प्रकृति का सुखद सुंदर रूप विकृत होता जा रहा है |प्रकृति को अपने रूप में लाने के लिए हमें अपनी जीवनशैली बदलनी होगी  नासिरा शर्मा कहती हैं कि...
“अगर कुदरत से इंसान दोस्ती रखे तो वह अपना पूरा सहयोग देती है |” (308)
जल है तो कल है यह हम क्यों भूलते जा रहे हैं | रचनाकार ने प्रकृति और जंतुओं को जोड़ा है | बिना जल या यो कहें कि शुद्ध साफ जल के कोई भी जी नहीं पाएगा या फिर अनेक रोगों से ग्रस्त होगा ...
“राजस्थान में कई स्थानों पर  या तो  पानी की किल्लत रहती है या फिर गंदा पानी पीने की विवशता है परिणामस्वरूप लोग अनेक बिमारियों के शिकार होते हैं “अतिसार, हैजा, कृमिरोग, पेचिश, मोतीझारा, पीलिया, जुकाम, चर्मरोग, अंधापन, आंत्रशोध, लकवा, नारू,अमिबोविसिस एवं पेट – संबंधी अनेक रोग अशुद्ध जल पीने की देन हैं|”(308)
कुइंयाजान में बार-बार यह विचार उभर कर आता है कि मनुष्य  आधुनिकता बनाम तकनीकी का अंधाधुंध प्रयोग कर क्षण भर की ख़ुशी तो हासिल कर रहा है, पर जीवन भर के गम को दावत भी दे रहा है | फिर बचेगा क्या ? एक नीरस भयावह दृश्य जहाँ मनुष्य की जिजीविषा संघर्ष करने को विवश हो जाएगी ....
“ जब बर्फ गिरना बंद हो जाएगी,  हिमशिखर सफ़ेद से गहरे कत्थई रंग का वस्त्र धारण कर लेंगे, उस समय शोधकर्ता हडप्पा की खुदाई में पाए जाने वाली वस्तुओं की तरह ही पानी के पाए जाने वाले स्थानों पर भी शोध करेंगे, तब सूखी घाटियाँ अपना इतिहास बताएंगी ... देशों में पानी के बंटवारे को लेकर युद्ध की सम्भावनाएं दम तोड़ जाएंगी | चारों ओर शांति होगी – नो पेट्रोल, ना वाटर!”(364)
भविष्य में जल संकट की भयावहता से सतर्क करता है कुइंयाजान | मनुष्य यंत्र चालित होकर आज इतरा रहा है सब कुछ मुट्ठी में कर फूले नहीं समा रहा है किंतु उसे  पता नहीं कि वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है | जिस जीवन के लिए वह इतनी जद्दोजहद कर रहा है वह तो उसकी मुट्ठी से रेत की तरह फिसल रहा है .....
“वनस्पति न उग सकने के कारण बारिश नहीं होगी और जब बारिश नहीं होगी तो पेड़ नहीं उगेंगे | घास भी न होगी जिसे हम चूस सकें, न ओस टपकेगी जिसे हम चाट सकें | हम सिर्फ़ गोली खाएंगे | तरक्की करेंगे| बेहतरीन मशीने बनाएँगे- एक बटन से ज़माने को बदल डालने वाली मशीनें|” (272)
लेखिका ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के स्वार्थ की परत उघाड़ी है | “आज़ादी मिले एक अरसा हो गया, परन्तु स्वच्छ जल सबको बराबर नहीं मिला | उल्टा जिस गुलामी को हमने नकारा था  जल परियोजनाओं के चलते हम फिर उस दासता को स्वीकार कर रहे हैं | बहुराष्ट्रीय कम्पनियां किस तरह अपना उल्लू सीधा कर रही हैं,जब यह षड्यंत्र हमारी समझ में आ रहा है,तो उनकी समझ में क्यों नहीं आ रहा जो ऐसे अनुबंधों पर हस्ताक्षर करते हैं?” (219)
लेखिका ने  पर्यावरणीय असंतुलन की सारी जिम्मेदारी नीति- नियामकों पर नहीं डालतीं   बल्कि  हमारी भूलों की ओर भी  संकेत करती है|  यह भी स्पष्ट किया है कि पर्यावरणीय संकट हमारे किए का नतीजा है | इस रचना का पात्र कमाल सपना देखता है .....
 “उसकी आवाज सुन परिंदे घोसलों में फडफडाने लगते हैं| शाखाएं वेग से हिलने लगती हैं पत्तियाँ देखते ही देखते पेड़ों से  झर-झर गिरने लगती हैं और जंगल सूख जाता है | पत्तियों रहित शाखाओं  पर बैठे परिंदे गा नहीं, बल्कि डर से चीख रहे हैं | नीचे गहरी घाटी है | नदी बहते बहते सूख जाती है ! किनारों पर खड़े पानी पीने आए चौपाए- हाथी, नीलगाय, बारहसिंगा- अपनी-अपनी बोली में प्यास...प्यास चिल्ला रहे हैं| छोटी-बड़ी मछलियां तड़प-तड़प कर पत्थरों  पर सर पटकने लगती हैं!... यहाँ भी पानी नहीं है ...जहाँ जाता हूँ वहाँ सब सूखा मिलता है | कुएँ-कुइंया,पोखर-तालाब, नदी-नाले... |”
लेखिका भविष्य और आने वाली पीढ़ियों के प्रति चिंतित है |    
जाने अनजाने में विकास की नींव ने विनाश को न्योता दिया है | इसके परिणाम भुगतने के लिए पाठकों को आगाह किया है | लेखिका ने अनेक संदर्भों द्वारा बताया है कि हम पानी को लेकर पारम्परिक ज्ञान  भूलते जा रहे हैं | बाढ़ ,सूखा की कथाओं को एक सूत्र में गूँथ पानी के वज़ूद को बताया है |
पर्यावरण के प्रति ‘चेतना’ प्रत्येक व्यक्ति की चेतना होना आवश्यक है | विडम्बना ही है कि जिस देश में पानी और पर्यावरण को आस्था के रूप में देखा जाता है, पूजा जाता है , नदियों को माँ का दर्जा दिया गया है अर्थात प्रकृति के प्रति आदर की भावना बलवती बनी रहे | आज मनुष्य इसी भाव को छोटा और दकियानूसी समझ बैठा है यही कारण है कि मनुष्य जितना बड़ा होता गया, उतना छोटा होता गया है क्योंकि  ‘जल –जीवन’ को भुला बैठा है ऐसे में चाहे कितने भी रोबोट क्लोन जैसे आविष्कार हो जाएँ किंतु पानी का अस्तित्व संकट में रहा तो ये सारी उपलब्धियाँ व्यर्थ हो जाएँगी |
प्राकृतिक जल संपदा के स्रोतों के साथ मानवीय खिलवाड़ क्षणिक सुख तो पहुँचाता है किंतु भावी भीषण आपदाओं को आमंत्रित करता है जो तीसरे विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार कर सकता है |
यह रचना यथार्थ के धरातल पर रची गई है | लेखिका ने विचार और वर्णन के सुई धागे से संवेदना का ऐसा ताना – बाना बुना है जो कठिन भी है तो सराहनीय भी है |

 डॉ. मंजु शर्मा,
अध्यक्ष (हिंदी विभाग )
चिरेक इंटरनेशन स्कूल, हैदराबाद | (500084)


          









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