कलाकार की पहचान फुटपाथ पर | हाँ वो नन्हीं – मुन्नी कचनार सी उँगलियाँ जब
तराशती है मूर्तियाँ तो क्या यह हम जान – पाते हैं कि उसके पीछे सूखी - सूनी आँखों
में तैरता है एक सपना | एक रोटी का एक खिलौने का | रामू रो रहा था “माँ मुझे भी
वैसा ही खिलौना लादो ना !” माँ ने अनगिनत मूर्तियों का ढेर उसके सामने लगा दिया जो अपने कद्रदानों की
प्रतीक्षा करते-करते बेडौल हो गई थीं जिनपर अमीरी की धुँआ चढ़ चुकी थी | सच में
कहीं चूल्हा जल रहा है, कहीं बीड़ी की धुआँ में निराश मन यों उड़ रहा है कि क्या
फायदा ऐसी कड़ी मेहनत करने का , अब नहीं करेंगे |
लेकिन यही कला शोरुम में ‘शो’ की जाती है तो धेले के रूपए में पूछी गई यही
मूर्ति हजारों – लाखों में इठलाती है | इंसान समझता क्यों नहीं कि इसे बनाने वाला अपनी
ईमानदारी अपनी लगन, अपने पसीने से बनाता है | बड़े चाव से रंग भरता है लेकिन मात्र स्थान बदलने से इतना अंतर ? एक तरफ़ एक
कलाकार की छोटी सी जरुरत तो दूसरी ओर मुँह बाएँ खड़ी है शोहरत |
क्या कला किसी स्थान
विशेष की मोहताज ? नहीं | जरुरत है मन की आँखों से परखने वाले की, जरुरत है दौलत
के रंगीन चश्में को उतारने की| अगर इन गरीब कलाकार वैसे कलाकार कभी ‘गरीब’ नहीं
होता पर आज के परिवेश में यह कहना विवशता है |
खैर हम इन्हें जहाँ दसगुने दाम पर खरीदते हैं और ड्राइंगरूम में सजाकर अपने अमीर
होने का दावा करते हैं| यदि हम उनसे कुछ
खरीद लेते तो उनकी परेशानी कुछ कम करने में, उनके बच्चों को भी खिलौना दिलाने में कुछ
मदद ही कर लेते | अबकी बार जरुर सोचना ....... |
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