‘संपादकीय’ तमाम तामझामों पर से गिरे हुए झीने से
पर्दे को हटाता है | साथ ही चारों ओर ख़ुशी और अधिकारों के भ्रम को तोड़ता है |
निर्भया से दिशा तक दिशाहीन स्त्रियों के अधिकार | स्त्री हिंसा और शोषण के शिकंजे
में कैद है स्त्री | हाँ जी 21वीं शताब्दी की वो महिला जो पायलेट बन आसमान में
उड़ती है ,अंतरिक्ष की छाती को बींध अपनी कामयाबी के झंडे गाड़ती है| सुरक्षा बल
में शौर्य प्रदर्शन में,वित्त में,विद्या में,संसद में तो सड़क पर | कहाँ नहीं है महिला लेकिन
किस हाल में ? दहशत में है|
निर्भया के सुरक्षा कवच के रहते हुए भी न भय दूर हुआ और दिशा के चलते न दिशा ही
बदली | संपादकीय में यूनिसेफ की रिपोर्ट आँखे खोलने वाली है| तार-तार करती
है सारे नियमों और कानूनों को | आज भी स्त्री देह से परे नहीं है | शिशु से लेकर
वृद्धा तक सब मानसिक विकृतियों का शिकार हैं| कानून सुरक्षा हेतु अच्छी पहल है किंतु जब तक
सोच नहीं बदलेगी तब तक स्त्री शोषण की शिकार होती रहेंगी | वैज्ञानिक युग में जी
रहे हम समाज से आज भी बाल विवाह, स्त्री खतना,बलात्कार हिंसा जैसी बर्बरता को
स्त्री की नियति मान चलते बनते हैं | क्या ऐसा ही चलता रहेगा ? नहीं न !
यही उम्मीद की जा सकती है कि ‘वह सुबह कभी तो
आएगी ही !’
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