Saturday, April 11, 2020

मुक्त नहीं न ही सुरक्षित .....


‘संपादकीय’ तमाम तामझामों पर से गिरे हुए झीने से पर्दे को हटाता है | साथ ही चारों ओर ख़ुशी और अधिकारों के भ्रम को तोड़ता है | निर्भया से दिशा तक दिशाहीन स्त्रियों के अधिकार | स्त्री हिंसा और शोषण के शिकंजे में कैद है स्त्री | हाँ जी 21वीं शताब्दी की वो महिला जो पायलेट बन आसमान में उड़ती है ,अंतरिक्ष की छाती को बींध अपनी कामयाबी के झंडे गाड़ती है| सुरक्षा बल में शौर्य प्रदर्शन में,वित्त में,विद्या में,संसद में तो सड़क पर | कहाँ नहीं है महिला लेकिन किस हाल में ? दहशत में है| निर्भया के सुरक्षा कवच के रहते हुए भी न भय दूर हुआ और दिशा के चलते न दिशा ही बदली | संपादकीय में यूनिसेफ की रिपोर्ट आँखे खोलने वाली है| तार-तार करती है सारे नियमों और कानूनों को | आज भी स्त्री देह से परे नहीं है | शिशु से लेकर वृद्धा तक सब मानसिक विकृतियों का शिकार हैं| कानून सुरक्षा हेतु अच्छी पहल है किंतु जब तक सोच नहीं बदलेगी तब तक स्त्री शोषण की शिकार होती रहेंगी | वैज्ञानिक युग में जी रहे हम समाज से आज भी बाल विवाह, स्त्री खतना,बलात्कार हिंसा जैसी बर्बरता को स्त्री की नियति मान चलते बनते हैं | क्या ऐसा ही चलता रहेगा ? नहीं न !
यही उम्मीद की जा सकती है कि ‘वह सुबह कभी तो आएगी ही !’  

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